Politics: क्या भारत स्थायी आंदोलन की राजनीति का अखाड़ा बन गया?
देश में एक बार फिर विरोध-प्रदर्शनों की गूंज सुनाई दे रही है। कहीं छात्र सड़कों पर हैं, कहीं राजनीतिक दल संसद के भीतर और बाहर सरकार को घेर रहे हैं, तो कहीं अलग-अलग सामाजिक संगठन अपनी मांगों को लेकर धरना दे रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत में आंदोलन अब किसी एक मुद्दे की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक राजनीति का स्थायी हिस्सा बन चुके हैं?
ललित शर्मा: राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले डेढ़ दशक में भारत में आंदोलनों का स्वरूप, गति और प्रभाव तीनों बदले हैं। पहले आंदोलन किसी खास घटना तक सीमित रहते थे, लेकिन अब कई बार वे राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन जाते हैं। भारत का लोकतांत्रिक इतिहास आंदोलनों से भरा पड़ा है। आजादी की लड़ाई से लेकर जेपी आंदोलन और मंडल-कमंडल की राजनीति तक, जनता ने कई बार सड़क पर उतरकर अपनी बात रखी। लेकिन 2011 के बाद आंदोलन की राजनीति में एक नया दौर शुरू होता दिखाई दिया।
अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन केवल जनलोकपाल की मांग तक सीमित नहीं रहा। इसने यह संदेश दिया कि अगर किसी मुद्दे को व्यापक जनसमर्थन मिल जाए तो उसका असर सीधे राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ सकता है। इसके बाद लगभग हर बड़ा मुद्दा सड़क और सोशल मीडिया दोनों पर दिखाई देने लगा।
एक दशक… कई बड़े आंदोलन
अगर पिछले 15 वर्षों पर नजर डालें तो कई ऐसे आंदोलन सामने आते हैं जिन्होंने राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित किया। 2011 में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, 2012 में निर्भया आंदोलन, 2019-20 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ प्रदर्शन, 2020-21 में किसान आंदोलन, 2022 में अग्निपथ योजना के विरोध में युवाओं का आंदोलन, 2023 में पहलवानों का धरना, 2024 में परीक्षा और पेपर लीक से जुड़े छात्र प्रदर्शन और उसके बाद भी विभिन्न राज्यों में भर्ती परीक्षाओं, आरक्षण तथा स्थानीय मुद्दों पर लगातार विरोध देखने को मिला।
हाल के छात्र प्रदर्शनों ने भी इस बहस को फिर तेज किया है कि क्या विरोध अब भारतीय राजनीति की स्थायी धारा बन रहा है। इन आंदोलनों के कारण अलग-अलग थे, लेकिन इनका एक साझा पहलू था-इन सबने राजनीतिक एजेंडा और सार्वजनिक बहस को प्रभावित किया।
हर मुद्दे की मंजिल सड़क क्यों बन रही है?
यह सबसे बड़ा सवाल है। पहला कारण है कि लोगों को लगता है कि सड़क पर उतरने से उनकी आवाज ज्यादा तेजी से सुनी जाती है। दूसरा कारण है 24×7 मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म। पहले किसी आंदोलन को राष्ट्रीय पहचान मिलने में समय लगता था, लेकिन अब कुछ घंटों में ही कोई वीडियो या तस्वीर पूरे देश में चर्चा का विषय बन सकती है।
तीसरा कारण राजनीतिक प्रतिस्पर्धा है। विपक्ष किसी मुद्दे को जनआंदोलन बनाकर सरकार पर दबाव बनाना चाहता है, जबकि सरकार अपने फैसलों का बचाव करती है। इस कारण कई आंदोलन राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाते हैं।
सोशल मीडिया ने बदल दिया पूरा खेल
आज किसी आंदोलन का पहला मंच कई बार सड़क नहीं बल्कि मोबाइल फोन होता है।एक हैशटैग, एक वीडियो या एक लाइव प्रसारण लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। इससे संगठन बनाना आसान हुआ है और सूचना तेजी से फैलती है। हालांकि इसके साथ जोखिम भी बढ़ा है। अपुष्ट सूचनाएं, भ्रामक दावे और एडिट किए गए वीडियो भी तेजी से फैल सकते हैं। इसलिए किसी भी आंदोलन के दौरान तथ्य और अफवाह में अंतर करना पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
क्या आंदोलन अब राजनीतिक नैरेटिव तय करते हैं?
राजनीति केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं है। उससे पहले जनता के बीच एक धारणा बनती है और उसी को राजनीतिक भाषा में ‘नैरेटिव’ कहा जाता है। आज लगभग हर बड़ा आंदोलन किसी न किसी राजनीतिक नैरेटिव से जुड़ जाता है। सत्ता पक्ष उसे विकास, सुधार या प्रशासनिक निर्णय के रूप में पेश करता है, जबकि विपक्ष उसी मुद्दे को जन असंतोष के प्रतीक के रूप में सामने लाता है। यही कारण है कि कई बार किसी आंदोलन की राजनीतिक चर्चा उसकी मूल मांगों से भी बड़ी हो जाती है।
सरकार की चुनौती क्या होती है?
हर सरकार के सामने दो जिम्मेदारियां होती हैं। पहली—लोकतांत्रिक अधिकारों का सम्मान करना। दूसरी—कानून-व्यवस्था बनाए रखना। इसी संतुलन के कारण किसी आंदोलन पर सरकार का रवैया कई बार बहस का विषय बन जाता है। कुछ मामलों में बातचीत का रास्ता अपनाया जाता है, तो कुछ स्थितियों में प्रशासनिक कार्रवाई भी होती है। यही लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षा भी मानी जाती है।
क्या संसद की भूमिका बदल रही है?
कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि अधिक से अधिक विवाद सड़क पर पहुंच रहे हैं तो यह संवाद की चुनौती का संकेत हो सकता है। दूसरी राय यह है कि संसद और सड़क दोनों लोकतंत्र के वैध मंच हैं। संसद कानून बनाने का स्थान है, जबकि सड़क जनता की भावनाओं को सामने लाने का माध्यम हो सकती है। असल सवाल यह नहीं कि कौन ज्यादा महत्वपूर्ण है, बल्कि यह है कि दोनों के बीच संवाद कितना मजबूत है।
क्या भारत वास्तव में ‘स्थायी आंदोलन’ के दौर में है?
इसका जवाब ‘हां’ या ‘नहीं’ में देना आसान नहीं है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और यहां विरोध दर्ज कराना संवैधानिक अधिकार है। इसलिए आंदोलनों का होना अपने आप में असामान्य नहीं है। लेकिन जब हर बड़े सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक विवाद के बाद सड़क पर उतरना सामान्य प्रवृत्ति बन जाए, तब यह संकेत देता है कि लोकतांत्रिक संवाद के तरीके बदल रहे हैं।
लोकतंत्र की ताकत या नई चुनौती?
भारत में आंदोलन लोकतंत्र की परंपरा का हिस्सा रहे हैं और आगे भी रहेंगे। फर्क सिर्फ इतना है कि अब आंदोलन पहले से कहीं अधिक तेज, डिजिटल, व्यापक और राजनीतिक प्रभाव वाले हो गए हैं। यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत पूरी तरह ‘स्थायी आंदोलन’ के दौर में पहुंच चुका है।
लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि आज आंदोलन केवल विरोध का माध्यम नहीं रहे, बल्कि वे राजनीतिक विमर्श, जनमत निर्माण और लोकतांत्रिक दबाव की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया बन चुके हैं। आने वाले वर्षों में यह प्रवृत्ति भारतीय लोकतंत्र को और मजबूत करेगी या राजनीतिक टकराव को बढ़ाएगी, इसका जवाब समय और लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यशैली तय करेगी।



