एयरपोर्ट तैयार, लेकिन विदेशी एयरलाइंस क्यों नहीं दिखा रहीं दिलचस्पी? जानिए नोएडा-नवी मुंबई की असली चुनौती
नोएडा और नवी मुंबई के नए अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट तैयार हैं, लेकिन विदेशी एयरलाइंस अभी दूरी बनाए हुए हैं। जानिए यूजर फीस, घरेलू कनेक्टिविटी और पुराने नेटवर्क की वजह से क्यों नहीं भर रहीं उड़ानें।
भारत का एविएशन सेक्टर तेजी से विस्तार कर रहा है और इसी क्रम में नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट तथा नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट जैसे आधुनिक हवाई अड्डे तैयार किए गए हैं। उम्मीद थी कि इन एयरपोर्ट्स से दुनिया के कई देशों के लिए सीधी उड़ानें शुरू होंगी, लेकिन फिलहाल तस्वीर उम्मीद से अलग नजर आ रही है। अधिकांश विदेशी एयरलाइंस अभी इन नए एयरपोर्ट्स से संचालन शुरू करने के लिए तैयार नहीं हैं। सवाल यह है कि जब आधुनिक सुविधाओं से लैस एयरपोर्ट बन चुके हैं तो आखिर अंतरराष्ट्रीय विमानन कंपनियां यहां आने से क्यों हिचक रही हैं?
महंगी यूजर फीस बढ़ा रही एयरलाइंस की चिंता
किसी भी नए एयरपोर्ट से उड़ान शुरू करने से पहले एयरलाइंस सबसे पहले वहां के परिचालन खर्च और शुल्क का आकलन करती हैं। नए एयरपोर्ट्स के निर्माण पर भारी निवेश किया गया है, जिसकी भरपाई के लिए यूजर डेवलपमेंट फीस (UDF) अपेक्षाकृत अधिक रखी गई है।
नोएडा एयरपोर्ट से अंतरराष्ट्रीय यात्रा करने वाले यात्रियों को दिल्ली एयरपोर्ट की तुलना में अधिक UDF चुकानी होगी। इसी तरह नवी मुंबई एयरपोर्ट पर भी यह शुल्क मुंबई के मौजूदा एयरपोर्ट से काफी ज्यादा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अधिक शुल्क का सीधा असर टिकट की कीमत पर पड़ता है, जिससे यात्रियों की संख्या प्रभावित हो सकती है और यही आशंका विदेशी एयरलाइंस को सतर्क बनाए हुए है।
पुराने एयरपोर्ट्स का मजबूत नेटवर्क भी बड़ी वजह
दिल्ली और मुंबई के मौजूदा एयरपोर्ट वर्षों से अंतरराष्ट्रीय विमानन कंपनियों के बड़े ऑपरेशन सेंटर बने हुए हैं। यहां ग्राउंड हैंडलिंग, कार्गो, तकनीकी सहायता, मेंटेनेंस और ट्रांजिट यात्रियों का मजबूत नेटवर्क पहले से मौजूद है।
दिल्ली एयरपोर्ट के पास अभी भी अतिरिक्त क्षमता उपलब्ध है, जबकि मुंबई एयरपोर्ट अपनी सीमा के करीब होने के बावजूद एयरलाइंस के लिए स्थापित केंद्र बना हुआ है। ऐसे में कंपनियां अपने पुराने और सफल नेटवर्क को छोड़कर नए एयरपोर्ट पर जोखिम लेने से फिलहाल बच रही हैं।
घरेलू कनेक्टिविटी की कमी भी बन रही बाधा
अंतरराष्ट्रीय उड़ानों की सफलता काफी हद तक घरेलू नेटवर्क पर निर्भर करती है। छोटे शहरों से आने वाले यात्री ही लंबी दूरी की अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को पर्याप्त संख्या में भरते हैं।
फिलहाल नोएडा और नवी मुंबई एयरपोर्ट पर घरेलू उड़ानों का नेटवर्क उतना मजबूत नहीं है, जितना किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय हब के लिए जरूरी माना जाता है। यही कारण है कि विदेशी एयरलाइंस को इन एयरपोर्ट्स से पर्याप्त यात्री मिलने का भरोसा नहीं बन पा रहा है।
भारतीय एयरलाइंस भी फिलहाल सतर्क
दिलचस्प बात यह है कि केवल विदेशी एयरलाइंस ही नहीं, बल्कि देश की प्रमुख विमानन कंपनियां भी नए एयरपोर्ट्स पर अंतरराष्ट्रीय संचालन शुरू करने में जल्दबाजी नहीं कर रही हैं।
एयर इंडिया और इंडिगो जैसी कंपनियां अभी अपने मौजूदा नेटवर्क को मजबूत करने पर ध्यान दे रही हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि नए एयरपोर्ट्स पर अंतरराष्ट्रीय ट्रैफिक विकसित होने में अभी कुछ समय लग सकता है।
विशेषज्ञों को भविष्य से उम्मीद
एविएशन विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति स्थायी नहीं है। जैसे-जैसे इन एयरपोर्ट्स पर घरेलू उड़ानों की संख्या बढ़ेगी और यात्रियों की आवाजाही में इजाफा होगा, एयरपोर्ट्स की कमाई केवल यूजर फीस पर निर्भर नहीं रहेगी। दुकानों, पार्किंग, विज्ञापन और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों से आय बढ़ने के बाद एयरपोर्ट ऑपरेटर शुल्क कम कर सकते हैं। इससे एयरलाइंस का परिचालन खर्च घटेगा और नए अंतरराष्ट्रीय रूट शुरू करना उनके लिए अधिक लाभदायक बन सकता है।
फिलहाल नोएडा और नवी मुंबई के नए एयरपोर्ट्स को अंतरराष्ट्रीय हब बनने के लिए कुछ और समय का इंतजार करना पड़ सकता है। जब घरेलू कनेक्टिविटी मजबूत होगी, यात्रियों की संख्या बढ़ेगी और परिचालन लागत कम होगी, तब विदेशी एयरलाइंस भी इन एयरपोर्ट्स को अपने नेटवर्क में शामिल करने पर गंभीरता से विचार कर सकती हैं। तब तक इन दोनों अत्याधुनिक हवाई अड्डों की रौनक मुख्य रूप से घरेलू उड़ानों के भरोसे ही आगे बढ़ती दिखाई देगी।



