IIT दीक्षांत में वैदिक मंत्रों पर बवाल, संविधान से वैज्ञानिक सोच तक छिड़ी बहस
IIT दिल्ली के 57वें दीक्षांत समारोह में वैदिक मंत्रोच्चारण को लेकर शुरू हुआ विवाद अब संविधान के प्रावधानों और वैज्ञानिक सोच तक पहुंच गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में हुए समारोह को लेकर AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने अनुच्छेद 28 और 51A(H) का हवाला देते हुए सवाल उठाए हैं। इसके बाद शिक्षण संस्थानों में धार्मिक परंपराओं और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है।
IIT दिल्ली का 57वां दीक्षांत समारोह सामान्य शैक्षणिक आयोजन से आगे बढ़कर राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। समारोह में वैदिक मंत्रोच्चारण हुआ और इस दौरान छात्रों के खड़े होने को लेकर भी सवाल उठाए गए।
विवाद का केंद्र यह सवाल है कि देश के प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान में धार्मिक परंपरा से जुड़े मंत्रोच्चारण की क्या भूमिका होनी चाहिए। एक पक्ष इसे भारतीय परंपरा और संस्कृति का हिस्सा बता रहा है, जबकि दूसरे पक्ष की ओर से इसे संवैधानिक मूल्यों और वैज्ञानिक सोच के संदर्भ में देखा जा रहा है।
वैज्ञानिक सोच के नाम पर ओवैसी ने उठाए सवाल
AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इस पूरे मामले को संविधान के अनुच्छेद 51A(H) से जोड़ दिया है। यह प्रावधान नागरिकों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और सवाल करने की भावना विकसित करने की बात करता है।
ओवैसी का कहना है कि शिक्षण संस्थानों में वैज्ञानिक सोच को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उनके बयान के बाद सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर दो अलग-अलग राय सामने आने लगी हैं।
एक तरफ लोग IIT जैसे संस्थान में धार्मिक मंत्रोच्चारण पर सवाल उठा रहे हैं, तो दूसरी तरफ समर्थकों का कहना है कि भारतीय संस्कृति और परंपराओं को किसी शैक्षणिक समारोह में जगह देना वैज्ञानिक सोच के खिलाफ नहीं माना जाना चाहिए।
अनुच्छेद 28 का जिक्र, सरकारी संस्थानों पर सवाल
ओवैसी ने संविधान के अनुच्छेद 28 का भी हवाला दिया है। उनके मुताबिक, पूरी तरह सरकारी धन से संचालित शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा को लेकर संवैधानिक सीमाएं तय हैं।
इसी आधार पर उन्होंने IIT जैसे संस्थानों में वैदिक मंत्रोच्चारण को लेकर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, यह भी महत्वपूर्ण है कि समारोह में मंत्रोच्चारण को लेकर सामने आई प्रतिक्रियाएं एक जैसी नहीं हैं। कुछ लोग इसे धार्मिक शिक्षा के बजाय पारंपरिक या सांस्कृतिक कार्यक्रम का हिस्सा मान रहे हैं।
यही अंतर अब बहस का सबसे बड़ा आधार बन गया है कि किसी धार्मिक परंपरा के सार्वजनिक प्रदर्शन और धार्मिक शिक्षा के बीच संवैधानिक रूप से क्या फर्क है।
छात्रों से बोले ओवैसी-राष्ट्रीय हित में सवाल करना भी जरूरी
ओवैसी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टैग करते हुए छात्रों को राष्ट्रीय हित को लेकर भी संदेश दिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय हित का अर्थ केवल सरकार का समर्थन करना नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर सरकार से सवाल करना भी है।
इस बयान के बाद बहस दीक्षांत समारोह से निकलकर लोकतंत्र, असहमति और छात्रों की भूमिका तक पहुंच गई है। यानी अब मुद्दा सिर्फ मंत्रोच्चारण का नहीं रह गया, बल्कि यह सवाल भी उठ रहा है कि देश के प्रमुख शिक्षण संस्थानों में छात्रों को वैज्ञानिक सोच और लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ किस तरह तैयार किया जाना चाहिए।
कांग्रेस ने भी समारोह को लेकर उठाए सवाल
IIT दिल्ली के समारोह को लेकर कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता शमा मोहम्मद भी सवाल उठा चुकी हैं। उनके सवालों के बाद इस मुद्दे को राजनीतिक रंग और ज्यादा मिल गया।
अब विपक्ष की ओर से उठाए जा रहे सवालों में धर्मनिरपेक्षता, वैज्ञानिक सोच और संवैधानिक प्रावधान प्रमुख हैं, जबकि दूसरी तरफ समारोह के समर्थन में भारतीय संस्कृति और परंपरा का तर्क दिया जा रहा है।
IIT विवाद में अब असली बहस क्या है?
IIT दिल्ली के दीक्षांत समारोह का विवाद अब दो अलग-अलग विचारों के बीच खड़ा दिखाई दे रहा है। एक ओर धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को सार्वजनिक जीवन में सम्मान देने की बात है, तो दूसरी ओर शिक्षण संस्थानों की संवैधानिक प्रकृति और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को लेकर सवाल हैं।
अनुच्छेद 28 और 51A(H) के हवाले ने इस विवाद को संवैधानिक बहस में बदल दिया है। आने वाले दिनों में यह चर्चा और तेज हो सकती है कि सरकारी शिक्षण संस्थानों में सांस्कृतिक परंपराओं और धार्मिक प्रतीकों की स्वीकार्य सीमा क्या होनी चाहिए और वैज्ञानिक सोच के साथ उनका संतुलन कैसे बनाया जाए।



