संसद में हंगामे पर हरिवंश की दो टूक, बोले- लोकतंत्र की साख कमजोर करने की कोशिश चिंता की बात
राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण ने संसद के मानसून सत्र में लगातार हंगामे और कार्यवाही बाधित होने पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि सरकार और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है कि सदन चले और संसदीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता बनी रहे।
हरिवंश नारायण ने कहा कि संसद को लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण मंच माना जाता है, लेकिन लगातार नारेबाजी और कार्यवाही में रुकावट से इसकी गरिमा प्रभावित होती है। उन्होंने कहा कि संविधान की प्रतियां लेकर प्रदर्शन करना आसान है, लेकिन संविधान के प्रति वास्तविक सम्मान हमारे व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए। उनके मुताबिक संसद की कार्यवाही रुकने से सिर्फ विधायी काम प्रभावित नहीं होता, बल्कि आम लोगों के बीच संसदीय व्यवस्था को लेकर भरोसा भी कमजोर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक और भू-राजनीतिक परिस्थितियों में राजनीतिक दलों को मिलकर देश के हित में काम करने की जरूरत है।
सरकार और विपक्ष दोनों की बराबर जिम्मेदारी
हरिवंश ने स्पष्ट किया कि सदन को सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। विपक्ष की भी उतनी ही जिम्मेदारी है कि वह अपनी बात लोकतांत्रिक तरीके से सदन में रखे। उन्होंने कहा कि यदि किसी एक पक्ष ने यह तय कर लिया कि कार्यवाही चलने नहीं दी जाएगी, तो संसद में वही स्थिति पैदा होती है जैसी हाल के दिनों में देखने को मिली। उनके अनुसार सत्ता आती-जाती रहती है, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा लंबे समय तक बनी रहनी चाहिए।
‘लोकतंत्र की साख पर सीधा प्रहार’
हरिवंश ने मौजूदा सत्र को लेकर कहा कि संसद का कामकाज कितना हुआ, इसके आंकड़े सामने हैं, लेकिन लगातार व्यवधान संसदीय लोकतंत्र को अविश्वसनीय बनाने की दिशा में गंभीर चिंता पैदा करता है। उन्होंने कहा कि अगर फैसले संसद के बजाय सड़कों पर होने लगें और सदन के भीतर भी चर्चा की जगह अवरोध दिखाई दे, तो यह देश के करोड़ों नागरिकों के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने अपने लंबे पत्रकारिता अनुभव और करीब 12 वर्षों के संसदीय अनुभव का भी उल्लेख किया।
नेहरू की बात का किया जिक्र
हरिवंश ने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की 1958 में राज्यसभा में कही बात का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि नेहरू संसद की गरिमा और अनुशासन को देश के लिए उदाहरण मानते थे। हरिवंश ने कहा कि संसद पर देश की करोड़ों निगाहें रहती हैं और जनप्रतिनिधियों को अपने आचरण से लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए मिसाल पेश करनी चाहिए।
पेपर लीक पर छात्रों से भी की अपील
पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी को लेकर हो रहे छात्र आंदोलनों पर हरिवंश ने कहा कि यह समस्या कई दशकों से बनी हुई है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब व्यवस्था की कमियां पहले से सामने आती रही हैं तो उनके स्थायी समाधान पर पहले ध्यान क्यों नहीं दिया गया। उन्होंने छात्रों से केवल शिक्षा के मुद्दे तक सीमित न रहने और शासन-व्यवस्था में सुधार की जरूरत पर भी विचार करने की अपील की। उन्होंने सरकार की ओर से छात्रों की मांगों को लेकर दिखाई गई संवेदनशीलता की भी सराहना की।



