Digital Rules : PM पर आपत्तिजनक पोस्ट कैसे हटती, कानून क्या कहता?
सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री और अन्य संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के खिलाफ कथित आपत्तिजनक, अभद्र या भड़काऊ पोस्ट को लेकर दिल्ली पुलिस ने सख्त रुख अपनाया है। ऐसे मामलों में सरकार, पुलिस और सोशल मीडिया कंपनियां किस प्रक्रिया के तहत कार्रवाई करती हैं और कानून में क्या प्रावधान हैं, आइए विस्तार से समझते हैं।
यदि किसी पोस्ट या वीडियो को कानून-व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक शांति के लिए खतरा माना जाता है, तो केंद्र सरकार और जांच एजेंसियां सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को उसे हटाने या ब्लॉक करने का निर्देश दे सकती हैं।
आईटी एक्ट, 2000 की धारा 69A केंद्र सरकार को ऐसे डिजिटल कंटेंट को ब्लॉक कराने का अधिकार देती है, जिसे देश की संप्रभुता, सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए नुकसानदायक माना जाए। इसके लिए इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के तहत निर्धारित प्रक्रिया अपनाई जाती है।
36 घंटे के भीतर कार्रवाई का नियम
आईटी नियम 2021/2023 के तहत यदि सोशल मीडिया कंपनियों को सरकार, अदालत या किसी सक्षम जांच एजेंसी का वैध आदेश मिलता है, तो उन्हें निर्धारित समय सीमा के भीतर संबंधित कंटेंट हटाना या ब्लॉक करना होता है।
वहीं, BNSS की धारा 94 के तहत पुलिस प्लेटफॉर्म्स के नोडल अधिकारियों को नोटिस भेजकर विवादित पोस्ट हटाने के साथ संबंधित यूजर की तकनीकी जानकारी, जैसे IP एड्रेस, मोबाइल नंबर और ईमेल आदि मांग सकती है।
सोशल मीडिया कंपनियां क्या करती हैं?
नोटिस मिलने के बाद संबंधित प्लेटफॉर्म की लीगल और कंप्लायंस टीम पहले उसकी वैधता की जांच करती है।
यदि कंटेंट भारतीय कानून का उल्लंघन करता है लेकिन कंपनी की वैश्विक नीति के तहत प्रतिबंधित नहीं है, तो उसे भारत में जियो-ब्लॉक किया जा सकता है। यानी वह कंटेंट केवल भारत में दिखाई नहीं देगा। गंभीर मामलों में पोस्ट या वीडियो पूरी तरह हटाया भी जा सकता है।
नियमों का पालन नहीं किया तो कंपनियों पर भी कार्रवाई
आईटी एक्ट की धारा 79 सोशल मीडिया कंपनियों को यूजर के कंटेंट के लिए सीमित कानूनी सुरक्षा देती है।
लेकिन यदि कोई प्लेटफॉर्म तय नियमों के अनुसार कार्रवाई नहीं करता या समय पर कंटेंट नहीं हटाता, तो यह कानूनी सुरक्षा समाप्त हो सकती है। ऐसी स्थिति में कंपनी और उसके अधिकारियों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है।
‘फर्स्ट ओरिजिनेटर’ की पहचान भी मांगी जा सकती है
गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों में अदालत या सक्षम सरकारी आदेश मिलने पर मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स से किसी संदेश के ‘फर्स्ट ओरिजिनेटर’ यानी उसे सबसे पहले भेजने वाले व्यक्ति की पहचान से जुड़ी जानकारी भी मांगी जा सकती है।
गलत पोस्ट करने वाले यूजर पर क्या हो सकती है कार्रवाई?
यदि किसी यूजर के खिलाफ मामला दर्ज होता है, तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उसके अकाउंट को अस्थायी या स्थायी रूप से निलंबित कर सकता है। साथ ही जांच एजेंसियों को तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराई जा सकती है।
कानूनी स्तर पर मामले की प्रकृति के अनुसार अलग-अलग धाराएं लग सकती हैं। इनमें BNS की धारा 356 (मानहानि), धारा 353 (लोक व्यवस्था प्रभावित करने से जुड़े प्रावधान), धारा 352 (जानबूझकर अपमान कर शांति भंग करने का आरोप), धारा 196(1)(a) (नफरत या वैमनस्य फैलाने से जुड़े आरोप) तथा आईटी एक्ट की धाराएं 66, 66D और 67 शामिल हो सकती हैं। इन धाराओं के तहत अपराध की प्रकृति के अनुसार जेल, जुर्माना या अन्य कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है।
दिल्ली पुलिस ने दर्ज किया मामला
दिल्ली पुलिस ने प्रधानमंत्री के खिलाफ कथित आपत्तिजनक सोशल मीडिया पोस्ट के मामले में 38 वर्षीय एक व्यक्ति के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) और आईटी एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है। जांच एजेंसियां अब डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई कर रही हैं।
क्या है सबसे अहम बात?
सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक संवैधानिक अधिकार है, लेकिन इसके साथ कानूनी जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। किसी भी पोस्ट पर कार्रवाई इस बात पर निर्भर करती है कि उसका स्वरूप क्या है, वह किस कानून का उल्लंघन करता है और जांच एजेंसियों को उसके खिलाफ क्या साक्ष्य मिलते हैं। ऐसे मामलों में सरकार, पुलिस, अदालत और सोशल मीडिया कंपनियां तय कानूनी प्रक्रिया के तहत ही आगे की कार्रवाई करती हैं।



