Health Alert: दून अस्पताल में लापरवाही! तड़पता रहा मरीज, जूनियर डॉक्टरों ने बचाई जान
उत्तराखंड के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल दून अस्पताल में इलाज व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि गंभीर रूप से घायल एक युवक इमरजेंसी में सर्जरी का इंतजार करता रहा, लेकिन कई विभागों के वरिष्ठ डॉक्टर मौके पर नहीं पहुंचे। आखिरकार जूनियर डॉक्टरों की टीम ने मोर्चा संभाला और इमरजेंसी में ही ऑपरेशन कर उसकी जान बचाने की कोशिश की। अब अस्पताल प्रशासन ने मामले में स्पष्टीकरण तलब करने की बात कही है।
जानकारी के मुताबिक विकासनगर के छरबा निवासी राजू गंभीर हादसे का शिकार हो गया। उसके ऊपर भारी पत्थर गिरने से सिर, चेहरा, आंख, जबड़ा और नाक पर गंभीर चोटें आईं। हालत नाजुक होने पर उसे तत्काल दून अस्पताल की इमरजेंसी में भर्ती कराया गया, जहां कई विशेषज्ञ विभागों की जरूरत थी।
सीनियर डॉक्टरों के नहीं पहुंचने का आरोप
घटना के बाद आरोप लगा कि जरूरत के बावजूद कई विभागों के वरिष्ठ डॉक्टर मौके पर नहीं पहुंचे। परिजनों और अस्पताल सूत्रों के अनुसार, नेत्र विभाग से पहुंचे जूनियर रेजिडेंट ने मरीज का निरीक्षण कर तस्वीरें लीं और लौट गए, जबकि न्यूरो सर्जरी विभाग से कोई डॉक्टर मौके पर नहीं पहुंचा। इन आरोपों ने अस्पताल की इमरजेंसी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जूनियर डॉक्टरों ने संभाली जिम्मेदारी
जब वरिष्ठ डॉक्टर उपलब्ध नहीं हुए तो अलग-अलग विभागों के जूनियर डॉक्टरों और रेजिडेंट्स ने मिलकर मरीज का इलाज शुरू किया। ईएनटी, एनेस्थीसिया, डेंटल, सर्जरी और प्लास्टिक सर्जरी विभाग के डॉक्टरों ने समन्वय बनाकर इमरजेंसी में ही जटिल सर्जरी की। इसी टीम की त्वरित कार्रवाई से मरीज की जान बचाने का प्रयास किया गया।
मरीज की हालत अब भी गंभीर
अस्पताल प्रशासन के अनुसार ऑपरेशन के बाद मरीज को आईसीयू में भर्ती किया गया है, जहां उसकी हालत अभी भी गंभीर बनी हुई है। डॉक्टर लगातार उसकी निगरानी कर रहे हैं और आगे का इलाज जारी है।
अस्पताल प्रशासन ने क्या कहा?
दून अस्पताल के डिप्टी मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. विनम्र मित्तल ने स्वीकार किया कि मरीज की स्थिति बेहद गंभीर थी और तत्काल इमरजेंसी सर्जरी करनी पड़ी। उन्होंने कहा कि जिन डॉक्टरों को बुलाने के बावजूद वे मौके पर नहीं पहुंचे, उनसे स्पष्टीकरण मांगा जाएगा। मामले की जांच के बाद आगे की प्रशासनिक कार्रवाई की जाएगी।
एक घटना, कई बड़े सवाल
यह मामला केवल एक मरीज के इलाज तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी अस्पतालों में ऑन-कॉल ड्यूटी, आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था और सीनियर डॉक्टरों की जवाबदेही पर भी सवाल खड़े करता है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह स्वास्थ्य व्यवस्था में समन्वय और जिम्मेदारी तय करने की आवश्यकता को फिर सामने लाता है। दूसरी ओर, इस पूरे घटनाक्रम में जूनियर डॉक्टरों की तत्परता ने एक गंभीर मरीज को समय पर इलाज उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।



