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Asmita Dey Success Story: अस्मिता डे ने रचा इतिहास, कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत को दिलाया पहला महिला जूडो गोल्ड Meta

  कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में त्रिपुरा की अस्मिता डे ने भारतीय खेल इतिहास में नया अध्याय जोड़ दिया। महिलाओं की 48 किलोग्राम जूडो स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीतकर वह कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के लिए जूडो का पहला महिला स्वर्ण पदक जीतने वाली खिलाड़ी बन गईं। साइकिल मैकेनिक के घर से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने का उनका सफर संघर्ष, आर्थिक तंगी, मेहनत और अटूट हौसले की मिसाल है।

दक्षिण त्रिपुरा के बेलोनिया की रहने वाली अस्मिता डे ने महिलाओं की 48 किलोग्राम जूडो स्पर्धा के फाइनल में कनाडा की हाइडी क्वाक को गोल्डन स्कोर में हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया।

इस जीत के साथ वह कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास में जूडो स्पर्धा में भारत के लिए पहला महिला गोल्ड मेडल जीतने वाली खिलाड़ी बन गईं। उनकी इस उपलब्धि ने भारतीय जूडो को नई पहचान दिलाई है।

800 मीटर दौड़ से शुरू हुआ था खेल सफर

अस्मिता का खेल करियर शुरुआत में जूडो से नहीं, बल्कि एथलेटिक्स से जुड़ा था। वर्ष 2015 में त्रिपुरा स्पोर्ट्स स्कूल में दाखिले के बाद उन्होंने 800 मीटर दौड़ में हिस्सा लेना शुरू किया।

बाद में कोच की सलाह पर उन्होंने जूडो को चुना। बेलोनिया कोचिंग सेंटर की बीना देबनाथ और त्रिपुरा स्पोर्ट्स स्कूल के कोच माणिक लाल देब ने उनकी प्रतिभा को निखारा और उन्हें राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया।

आर्थिक तंगी के बावजूद नहीं छोड़ा सपना

अस्मिता के पिता बेलोनिया में साइकिल मरम्मत की छोटी-सी दुकान चलाते थे। परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी, लेकिन उन्होंने बेटी के सपनों को कभी टूटने नहीं दिया।

साल 2023 में ताशकंद ग्रैंड स्लैम में भाग लेने के लिए उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं थे। सरकारी मदद नहीं मिलने के कारण वह प्रतियोगिता में हिस्सा भी नहीं ले सकीं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और लगातार मेहनत जारी रखी।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जीते कई पदक

अस्मिता ने कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले भी कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का नाम रोशन किया। उन्होंने 2022 एशियन कैडेट एवं जूनियर जूडो चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता।

इसके अलावा 2023 कुवैत एशियन ओपन में रजत पदक, जूनियर एशियन कप में स्वर्ण पदक और 2025 कासाब्लांका अफ्रीकन ओपन में भी गोल्ड मेडल जीतकर अपनी प्रतिभा साबित की। वह भारतीय जूडो टीम में जगह बनाने वाली त्रिपुरा की पहली खिलाड़ी भी हैं।

पिता के निधन के बाद भी नहीं टूटा हौसला

दिसंबर 2025 में अस्मिता के पिता का निधन हो गया, जिससे उन्हें गहरा सदमा लगा। उन्होंने स्वीकार किया कि उस समय उन्हें लगा था कि उनका सबसे बड़ा सहारा छिन गया है।

इसके बावजूद उन्होंने खुद को संभाला, एशियन गेम्स ट्रायल्स में शानदार प्रदर्शन कर राष्ट्रीय स्तर पर पहला स्थान हासिल किया और फिर कॉमनवेल्थ गेम्स में ऐतिहासिक गोल्ड जीतकर अपने दिवंगत पिता का सपना पूरा किया। जीत के बाद भावुक अस्मिता ने अपना स्वर्ण पदक अपने कोच और अपने पिता को समर्पित किया।

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