घर बेचना पड़ा, घरेलू हिंसा झेली… फिर भी नहीं हारीं; जानिए कैसे शर्मिला धनखड़ ने भारत को दिलाया ऐतिहासिक CWG गोल्ड
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में हरियाणा की पैरा एथलीट शर्मिला धनखड़ ने भारत के लिए ऐसा इतिहास रचा, जिसका इंतजार दो दशक से था। महिला शॉट पुट F57 स्पर्धा में 9.81 मीटर का सीजन का सर्वश्रेष्ठ थ्रो कर उन्होंने गोल्ड मेडल अपने नाम किया। लेकिन इस जीत के पीछे संघर्ष, दर्द, त्याग और अटूट हौसले की ऐसी कहानी छिपी है, जो हर किसी को प्रेरित करती है।
शर्मिला धनखड़ ने महिला शॉट पुट F57 वर्ग में शानदार प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल जीता। इसके साथ ही वह कॉमनवेल्थ गेम्स के पैरा एथलेटिक्स में भारत के लिए गोल्ड जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बन गईं। उनकी इस उपलब्धि ने न सिर्फ देश का गौरव बढ़ाया, बल्कि भारतीय पैरा खेलों के इतिहास में भी नया अध्याय जोड़ दिया।
दो साल की उम्र में पोलियो, लेकिन हिम्मत नहीं टूटी
हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले की रहने वाली शर्मिला धनखड़ को महज दो साल की उम्र में पोलियो हो गया था। इसका असर उनके एक पैर पर पड़ा और सामान्य जीवन भी चुनौती बन गया। बावजूद इसके उन्होंने अपनी कमजोरी को कभी अपनी पहचान नहीं बनने दिया। बाद में उन्होंने पैरा शॉट पुट और डिस्कस थ्रो को अपना लक्ष्य बनाया और लगातार मेहनत करती रहीं।
34 साल की उम्र में खेल शुरू कर दिया सबको जवाब
जहां अधिकांश खिलाड़ी बचपन से खेलना शुरू कर देते हैं, वहीं शर्मिला ने 34 वर्ष की उम्र में खेल की दुनिया में कदम रखा। वर्ष 2021 में उन्होंने पैरा नेशनल चैंपियनशिप में राष्ट्रीय रिकॉर्ड के साथ गोल्ड मेडल जीतकर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। इसके बाद उन्होंने लगातार अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया और अनुभव हासिल किया।
गरीबी, घरेलू हिंसा और आर्थिक तंगी से भरा रहा सफर
शर्मिला का जीवन शुरुआत से ही संघर्षों से भरा रहा। उनका बचपन आर्थिक तंगी में बीता। उनकी मां दृष्टिहीन थीं, जबकि पिता किसान थे। कम उम्र में शादी हुई, लेकिन पहली शादी में उन्हें घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ा। आखिरकार उन्होंने अपनी दो बेटियों के साथ नई जिंदगी शुरू करने का फैसला लिया। यह निर्णय आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय आगे बढ़ने का रास्ता चुना।
सपना पूरा करने के लिए परिवार ने बेच दिया अपना घर
दूसरी शादी के बाद उनके पति अजीत सिंह ने उनका हर कदम पर साथ दिया और पैरा खेलों में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। कोच टेक चंद और देवेंद्र के मार्गदर्शन में उन्होंने कड़ी मेहनत की। आर्थिक संकट इतना गहरा था कि वर्ष 2023 में परिवार को प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं का खर्च उठाने के लिए रेवाड़ी स्थित अपना घर तक बेचना पड़ा। आज भी उनका सपना अपना घर दोबारा खरीदने का है।
बेटियों के सपनों में दिखता है अपना भविष्य
शर्मिला की दोनों बेटियां भी खेलों से जुड़ी हैं। बड़ी बेटी अंजू जैवलिन थ्रो में और छोटी बेटी लक्ष्मी हाई जंप में अपनी पहचान बना रही हैं। शर्मिला चाहती हैं कि उनकी बेटियां वह अवसर और सम्मान हासिल करें, जो उन्हें संघर्षों के कारण आसानी से नहीं मिल सका। उनका मानना है कि खेल सिर्फ मेडल नहीं, बल्कि जिंदगी बदलने की ताकत भी देता है।
एक जीत नहीं, करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा
शर्मिला धनखड़ की कहानी केवल कॉमनवेल्थ गेम्स के गोल्ड मेडल तक सीमित नहीं है। यह उस महिला की कहानी है जिसने पोलियो, गरीबी, घरेलू हिंसा और आर्थिक संकट जैसी चुनौतियों के सामने कभी हार नहीं मानी। घर बेचने की मजबूरी से लेकर देश के लिए इतिहास रचने तक का उनका सफर इस बात का प्रमाण है कि मजबूत इरादों के आगे मुश्किलें भी छोटी पड़ जाती हैं। यही वजह है कि आज शर्मिला धनखड़ सिर्फ एक गोल्ड मेडलिस्ट नहीं, बल्कि लाखों लोगों के लिए संघर्ष, साहस और उम्मीद की नई पहचान बन चुकी हैं।



