उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों पर लगेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम, सरकार ने CBRI को दी अनुमति; वसुंधरा झील से होगी शुरुआत

राज्य सरकार ने CBRI को संवेदनशील हिमनद झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की अनुमति दी है। शुरुआत वसुंधरा झील से होगी।
अजय विक्रम सिंह
देहरादून: उत्तराखंड में हिमनद झीलों से जुड़े संभावित खतरों को देखते हुए राज्य सरकार ने केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (CBRI), रुड़की को ग्लेशियल झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की अनुमति दे दी है। इस व्यवस्था का पहला परीक्षण चमोली जिले की वसुंधरा झील में किया जाएगा। CBRI की टीम इसी महीने वहां उपकरण लगाने के लिए जाएगी।
यह कदम हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों से होने वाले संभावित ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के जोखिम को देखते हुए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राज्य में संवेदनशील हिमनद झीलों की पहचान और उनके अध्ययन के साथ-साथ शुरुआती चेतावनी प्रणाली विकसित करने पर काम किया जा रहा है।
वसुंधरा झील पर होगा सिस्टम का पहला परीक्षण
CBRI ने हिमनद झीलों के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम तैयार किया है। राज्य सरकार की अनुमति के बाद अब इसका वास्तविक परिस्थितियों में परीक्षण किया जाएगा।
मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन के अनुसार, CBRI की टीम इसी महीने वसुंधरा झील पर उपकरण लगाएगी। इसके बाद सिस्टम से मिलने वाली सूचनाओं का अध्ययन किया जाएगा। अगले वर्ष अप्रैल और मई में अन्य संवेदनशील झीलों पर भी सिस्टम लगाए जाने की योजना है।
उत्तराखंड में 13 संवेदनशील हिमनद झीलें
राज्य में कुल 13 संवेदनशील हिमनद झीलों की पहचान की गई है। ये झीलें पांच जिलों में स्थित हैं। इन 13 झीलों में:
- 5 झीलें A श्रेणी में हैं
- 4 झीलें B श्रेणी में हैं
- 4 झीलें C श्रेणी में हैं
अभी तक चार हिमनद झीलों के सर्वे का काम पूरा हो चुका है। इस वर्ष केदारताल और सरस्वती ताल का भी अध्ययन किए जाने की योजना है।
CBRI और C-DAC के सिस्टम की होगी तुलना
उत्तराखंड सरकार केवल CBRI की तकनीक पर निर्भर नहीं रहेगी। आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव विनोद कुमार सुमन के मुताबिक, CBRI के अलावा C-DAC के माध्यम से भी अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाए जाने की योजना है।
दोनों संस्थानों की प्रणालियों से प्राप्त परिणामों की तुलना की जाएगी। इससे राज्य को संवेदनशील हिमनद झीलों की निगरानी के लिए अधिक प्रभावी तकनीक चुनने में मदद मिल सकती है।
क्यों जरूरी है ग्लेशियल झीलों की निगरानी?
हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पीछे या उनके आसपास पानी जमा होने से ग्लेशियल झीलें बनती हैं। ऐसी झीलों में अचानक पानी का स्तर बढ़ने या प्राकृतिक बांध टूटने की स्थिति में नीचे की ओर तेज गति से पानी आने का खतरा हो सकता है।
ऐसे संभावित खतरे की स्थिति में यदि समय रहते चेतावनी मिल जाए तो प्रशासन और स्थानीय स्तर पर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की तैयारी की जा सकती है। इसी उद्देश्य से अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित किए जा रहे हैं।
करीब तीन साल से सिस्टम पर काम कर रहा CBRI
अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, CBRI रुड़की करीब तीन साल से इस अर्ली वार्निंग सिस्टम पर काम कर रहा है। अब इसे वसुंधरा झील पर पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर लगाने की तैयारी है। आपदा प्रबंधन विभाग ने परीक्षण के लिए सैद्धांतिक सहमति भी दे दी है।
राज्य में संवेदनशील ग्लेशियल झीलों को लेकर केंद्र और राज्य स्तर पर भी तैयारियां चल रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने उत्तराखंड आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को इसके लिए राशि उपलब्ध कराई है।
भविष्य में सभी संवेदनशील झीलों पर नजर
सरकार की योजना चरणबद्ध तरीके से सभी 13 संवेदनशील हिमनद झीलों को अर्ली वार्निंग सिस्टम से जोड़ने की है। वसुंधरा झील पर होने वाला पायलट परीक्षण इस दिशा में पहला बड़ा कदम होगा।
परीक्षण के दौरान मिलने वाले आंकड़ों और चेतावनी प्रणाली की कार्यक्षमता का आकलन करने के बाद अन्य झीलों पर इसकी तैनाती की दिशा में आगे बढ़ा जाएगा।
निष्कर्ष
उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की पहल आपदा प्रबंधन की दृष्टि से अहम है। वसुंधरा झील से शुरू होने वाला CBRI का पायलट प्रोजेक्ट यह परखने में मदद करेगा कि प्रणाली वास्तविक परिस्थितियों में कितनी प्रभावी है। इसके बाद राज्य की अन्य 12 संवेदनशील झीलों में भी ऐसी व्यवस्था लागू करने की योजना है।



