मिसाइलों के बाद अब ईरान की अर्थव्यवस्था पर हमला, ट्रंप की रणनीति कितनी कारगर?
अमेरिका और ईरान के बीच टकराव अब सैन्य कार्रवाई से आगे आर्थिक मोर्चे पर पहुंच गया है। ट्रंप प्रशासन ईरान के तेल कारोबार, शिपिंग और वित्तीय नेटवर्क पर दबाव बढ़ा रहा है। लेकिन चीन की खरीद और शैडो फ्लीट ईरान के लिए बड़ी ढाल बने हुए हैं।
अमेरिका अब ईरान पर सैन्य हमलों के साथ-साथ आर्थिक दबाव को भी बड़ा हथियार बना रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का संकेत है कि फिलहाल आर्थिक दबाव को असर दिखाने का मौका दिया जाए। अमेरिकी रणनीति का लक्ष्य ईरान की तेल से होने वाली कमाई को कम करना, उसके समुद्री नेटवर्क को बाधित करना और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था तक उसकी पहुंच सीमित करना है। वॉशिंगटन की कोशिश है कि आर्थिक दबाव से ईरान के लिए युद्ध और सैन्य गतिविधियों को जारी रखना महंगा हो जाए। इसी दबाव के जरिए अमेरिका तेहरान को बातचीत की मेज पर लाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन ईरान के पास प्रतिबंधों से बचने के कई पुराने रास्ते मौजूद हैं।
अमेरिका ने रणनीति क्यों बदली?
ईरान के खिलाफ लगातार सैन्य कार्रवाई के बावजूद संघर्ष का स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है। ऐसे में आर्थिक दबाव अमेरिका को बिना हर बार बड़े सैन्य अभियान के ईरान पर दबाव बनाए रखने का रास्ता देता है। तेल कारोबार को निशाना बनाना इस रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। अमेरिका का मकसद ईरान की विदेशी मुद्रा आय घटाना और उसकी सैन्य क्षमता को वित्तीय रूप से कमजोर करना है।
ईरान की तेल कमाई पर सबसे बड़ा वार
ईरान की अर्थव्यवस्था में तेल निर्यात की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए अमेरिकी प्रतिबंधों का मुख्य निशाना ईरानी तेल की बिक्री और उसकी अंतरराष्ट्रीय आवाजाही है। अमेरिका ईरानी तेल से जुड़े जहाजों, कंपनियों और व्यापारिक नेटवर्क पर प्रतिबंध बढ़ाकर उसकी कमाई रोकने की कोशिश कर रहा है। लेकिन चीन ईरानी तेल का बड़ा खरीदार बना हुआ है। हाल के अमेरिकी प्रतिबंधों में चीन और हांगकांग से जुड़ी कंपनियों तथा ईरानी तेल ढोने वाले टैंकरों को भी निशाना बनाया गया है।
शैडो फ्लीट से ईरान को मिल रही ढाल
ईरान ने वर्षों से अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए एक वैकल्पिक समुद्री नेटवर्क तैयार किया है, जिसे आम तौर पर ‘शैडो फ्लीट’ कहा जाता है। इसमें ऐसे टैंकरों और कारोबारी नेटवर्क का इस्तेमाल किया जाता है, जिनके जरिए तेल की असली उत्पत्ति, मालिकाना या अंतिम खरीदार को छिपाने की कोशिश होती है। फर्जी झंडे, जहाजों की पहचान बदलना और ट्रांसशिपमेंट जैसे तरीकों से प्रतिबंधों को दरकिनार करने के प्रयास किए जाते हैं। यही नेटवर्क अमेरिकी दबाव के बावजूद ईरानी तेल कारोबार को पूरी तरह बंद होने से बचाता है।
बैंकिंग और वित्तीय नेटवर्क भी निशाने पर
अमेरिकी रणनीति केवल तेल तक सीमित नहीं है। ईरान से जुड़े बैंकिंग, विदेशी मुद्रा और समुद्री वित्तीय नेटवर्क पर भी दबाव बढ़ाया जा रहा है। मकसद यह है कि ईरान तेल बेच भी ले तो उससे हासिल रकम को अंतरराष्ट्रीय कारोबार में इस्तेमाल करना आसान न रहे। अगर बैंकिंग चैनल सीमित होते हैं तो ईरान के लिए आयात, भुगतान और सैन्य जरूरतों के लिए विदेशी मुद्रा जुटाना मुश्किल हो सकता है। यही वजह है कि आर्थिक युद्ध में बैंकिंग नेटवर्क को भी महत्वपूर्ण मोर्चा माना जा रहा है।
चीन बना ट्रंप की रणनीति की सबसे बड़ी चुनौती
ईरान पर आर्थिक दबाव की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि उसका तेल कौन खरीदता है। चीन ईरानी तेल का प्रमुख बाजार बना हुआ है और अमेरिकी दबाव के बावजूद दोनों देशों के बीच ऊर्जा कारोबार जारी रहने की खबरें आती रही हैं। वॉशिंगटन के लिए समस्या यह है कि अगर चीन ईरानी तेल खरीदता रहता है तो ईरान की तेल आय को पूरी तरह रोकना बेहद कठिन होगा।
होर्मुज पर अटका सबसे बड़ा दांव
इस पूरी रणनीति में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज सबसे अहम मोर्चा बन गया है। यह समुद्री रास्ता वैश्विक ऊर्जा कारोबार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। ईरान ने होर्मुज को लेकर अपनी स्थिति को अमेरिका पर दबाव बनाने के साधन के तौर पर इस्तेमाल किया है। हालिया घटनाक्रम में ईरान ने संकेत दिया है कि रास्ता पूरी तरह खोलने का फैसला अमेरिकी प्रतिबंधों और सैन्य दबाव से जुड़े मुद्दों के समाधान से जुड़ा है। इससे वैश्विक तेल बाजार पर दबाव बना हुआ है।
क्या ईरान आर्थिक दबाव में झुकेगा?
यही ट्रंप की रणनीति की सबसे बड़ी परीक्षा है। प्रतिबंध और आर्थिक दबाव ईरान की कमाई को नुकसान पहुंचा सकते हैं, लेकिन इसका असर तत्काल और निर्णायक होना जरूरी नहीं है। चीन जैसे खरीदार, शैडो फ्लीट और वैकल्पिक भुगतान नेटवर्क ईरान को कुछ राहत देते हैं। इसलिए अमेरिका के लिए ईरान की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह अलग-थलग करना आसान नहीं होगा।
अमेरिका को भी चुकानी पड़ सकती है कीमत
आर्थिक दबाव का फायदा अमेरिका को यह है कि इसमें सीधे अमेरिकी सैनिकों को युद्ध में उतारने का जोखिम कम हो सकता है। लेकिन इसका दूसरा पहलू वैश्विक तेल कीमतों में बढ़ोतरी है। अगर होर्मुज में तनाव लंबा खिंचता है तो तेल और शिपिंग लागत बढ़ सकती है। इसका असर अमेरिका के सहयोगी देशों के साथ-साथ भारत जैसे बड़े तेल आयातकों पर भी पड़ सकता है।
भारत के लिए क्यों अहम?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। इसलिए ईरान-अमेरिका तनाव और होर्मुज में किसी भी तरह की लंबी बाधा से तेल की कीमत, शिपिंग लागत और भारत के आयात बिल पर असर पड़ सकता है। महंगा कच्चा तेल रुपये और महंगाई पर भी दबाव बढ़ा सकता है। यानी ट्रंप का ईरान पर आर्थिक दांव सिर्फ अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा तक पहुंच सकता है।
ट्रंप की रणनीति की असली परीक्षा अब
अमेरिका ईरान को सिर्फ मिसाइलों और सैन्य हमलों से नहीं, बल्कि उसकी कमाई के रास्तों को दबाकर कमजोर करने की कोशिश कर रहा है। तेल, जहाज, बैंकिंग और होर्मुज इस रणनीति के प्रमुख मोर्चे हैं। लेकिन चीन की खरीद और ईरान का शैडो फ्लीट नेटवर्क अमेरिकी दबाव की राह में बड़ी चुनौती बने हुए हैं। इसलिए आने वाले दिनों में सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि आर्थिक दबाव तेहरान को बातचीत के लिए मजबूर करता है या फिर संघर्ष को और लंबा खींच देता है।



