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सवर्णों के लिए बने केंद्रीय आयोग की मांग, BJP सांसदों की पहल से गरमाई यूपी की सियासत

आशुतोष शर्मा

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले सामान्य वर्ग यानी सवर्ण समुदाय से जुड़े मुद्दों ने एक बार फिर राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। केंद्रीय सवर्ण आयोग के गठन की मांग अब दिल्ली तक पहुंच गई है। BJP के कुछ सांसदों ने इस मांग को लेकर केंद्रीय मंत्रियों से मुलाकात की है और राष्ट्रीय स्तर पर सामान्य वर्ग के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक हितों के लिए एक अलग आयोग बनाने की पैरवी की है।

सांसदों की दलील है कि जब अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों से जुड़े संवैधानिक और वैधानिक आयोग मौजूद हैं, तो सामान्य वर्ग की समस्याओं और शिकायतों के लिए अलग राष्ट्रीय स्तर का संस्थागत तंत्र क्यों नहीं होना चाहिए।

हालांकि, अभी केंद्र सरकार की ओर से केंद्रीय सवर्ण आयोग बनाने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। फिलहाल यह मांग BJP के कुछ सांसदों और सवर्ण संगठनों की ओर से उठाई जा रही है।

BJP सांसदों ने केंद्रीय मंत्रियों से की मुलाकात

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, केंद्रीय सवर्ण आयोग की मांग करने वाले BJP सांसदों के एक समूह ने इस मुद्दे पर कई वरिष्ठ केंद्रीय नेताओं से मुलाकात की है। इनमें केंद्रीय मंत्री और BJP के वरिष्ठ नेता जेपी नड्डा से मुलाकात भी शामिल है। हालांकि, इन सांसदों के नाम सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए हैं।

सांसदों का कहना है कि सामान्य वर्ग के भीतर भी आर्थिक रूप से कमजोर परिवार बड़ी संख्या में हैं। ऐसे परिवारों की शिक्षा, रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी योजनाओं तक पहुंच से जुड़े मुद्दों के लिए एक राष्ट्रीय आयोग उनकी समस्याओं को सरकार तक प्रभावी ढंग से पहुंचा सकता है।

‘SC, ST और OBC आयोग हैं तो सवर्ण आयोग क्यों नहीं?’

केंद्रीय सवर्ण आयोग की मांग के पीछे सबसे प्रमुख तर्क यही है कि अलग-अलग सामाजिक समूहों से जुड़े आयोग पहले से मौजूद हैं, इसलिए सामान्य वर्ग के लिए भी ऐसा संस्थागत मंच होना चाहिए।

इस प्रस्ताव के समर्थकों का कहना है कि आयोग को केवल आरक्षण के मुद्दे तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। इसके दायरे में शिक्षा, रोजगार, आर्थिक पिछड़ापन, छात्रवृत्ति, सरकारी योजनाओं में पहुंच और सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की समस्याओं को शामिल किया जा सकता है।

इस मांग को लेकर उत्तर प्रदेश में भी हाल के दिनों में प्रदर्शन और ज्ञापन का सिलसिला देखने को मिला है। अमेठी में सवर्ण आर्मी ने राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन देकर राष्ट्रीय सवर्ण आयोग के गठन समेत कई मांगें उठाईं।

गरीब सवर्णों के लिए EWS को और प्रभावी बनाने की मांग

इस बहस का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा EWS यानी Economically Weaker Sections है।

सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए केंद्र की मौजूदा व्यवस्था में EWS आरक्षण का प्रावधान है। लेकिन आयोग की मांग करने वाले संगठनों का कहना है कि आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के परिवारों को शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं, छात्रवृत्ति और अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में कई स्तरों पर दिक्कतें आती हैं।

इसीलिए मांग उठ रही है कि प्रस्तावित आयोग को सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की वास्तविक स्थिति का अध्ययन करने और सरकार को कल्याणकारी योजनाओं पर सुझाव देने की जिम्मेदारी दी जाए।

बिहार मॉडल का दिया जा रहा उदाहरण

केंद्रीय सवर्ण आयोग की मांग में बिहार मॉडल का उदाहरण सबसे ज्यादा दिया जा रहा है।

बिहार में State Commission for Development of Upper Castes यानी उच्च जातियों के विकास के लिए राज्य आयोग मौजूद है। आयोग सामान्य वर्ग के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक विकास से जुड़े मुद्दों पर सरकार को सुझाव देता है।

बिहार में आयोग का गठन नया राजनीतिक प्रयोग नहीं है। राज्य में इससे पहले भी सवर्ण आयोग के माध्यम से सामान्य वर्ग की आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति का अध्ययन किया गया था। बाद में आयोग की संरचना को फिर से सक्रिय किया गया और 2025 में नई नियुक्तियां की गईं।

मौजूदा बिहार आयोग में महाचंद्र प्रसाद सिंह को अध्यक्ष और राजीव रंजन प्रसाद को उपाध्यक्ष बनाया गया है।

बिहार आयोग ने गरीब सवर्णों के लिए क्या सिफारिशें की हैं?

बिहार का उदाहरण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वहां आयोग ने सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए कई तरह की सिफारिशें की हैं।

इनमें शिक्षा, छात्रवृत्ति, आवास, रोजगार और EWS प्रमाणपत्र से जुड़ी समस्याओं पर सरकार को सुझाव देना शामिल है। हाल की रिपोर्टों में आयोग की ओर से गरीब भूमिहीन सामान्य वर्ग के परिवारों को आवास के लिए जमीन देने और EWS प्रमाणपत्र जारी करने में आने वाली दिक्कतों को दूर करने जैसी सिफारिशों का भी उल्लेख है।

यही बिहार मॉडल अब राष्ट्रीय स्तर पर आयोग की मांग करने वालों के लिए एक उदाहरण बन गया है।

UGC के नए नियमों का भी मुद्दे से कनेक्शन

केंद्रीय सवर्ण आयोग की मांग ऐसे समय तेज हुई है जब उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में UGC के 2026 के समानता संबंधी नियमों को लेकर सामान्य वर्ग के कुछ संगठनों में विरोध देखने को मिला है।

अमेठी में हालिया ज्ञापन में सवर्ण आर्मी ने UGC से जुड़े नियमों की वापसी, आरक्षण व्यवस्था में बदलाव और राष्ट्रीय सवर्ण आयोग के गठन जैसी मांगें एक साथ उठाईं।

सिद्धार्थनगर में भी विभिन्न संगठनों ने UGC नियमों, आरक्षण को आर्थिक आधार से जोड़ने और सवर्ण आयोग के गठन समेत कई मांगों को लेकर प्रदर्शन किया।

इससे साफ है कि सवर्ण आयोग की मांग अकेले किसी एक राजनीतिक दल या संगठन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे लेकर अलग-अलग सामाजिक संगठनों की गतिविधियां भी बढ़ी हैं।

यूपी चुनाव से पहले क्यों महत्वपूर्ण है यह मुद्दा?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक समीकरण हमेशा से चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। ऐसे में विधानसभा चुनाव से पहले सामान्य वर्ग से जुड़े मुद्दे का राष्ट्रीय स्तर पर उठना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

BJP के सामने चुनौती यह है कि वह विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच अपना समर्थन बनाए रखते हुए EWS और आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग की चिंताओं को किस तरह संबोधित करती है।

हालांकि, फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि केंद्रीय सवर्ण आयोग की मांग BJP की आधिकारिक चुनावी रणनीति का हिस्सा है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार यह पहल फिलहाल कुछ BJP सांसदों और सामाजिक संगठनों की मांग के रूप में सामने आई है।

क्या केंद्रीय सवर्ण आयोग आरक्षण व्यवस्था बदल देगा?

यह एक महत्वपूर्ण सवाल है।

सिर्फ किसी आयोग के गठन से मौजूदा आरक्षण व्यवस्था अपने आप नहीं बदलती। आयोग का गठन होने पर उसके अधिकार, कार्यक्षेत्र और सिफारिशों को सरकार द्वारा तय किया जाएगा।

आरक्षण का संवैधानिक और कानूनी ढांचा अलग विषय है। इसलिए सवर्ण आयोग की मांग को सीधे “जातिगत आरक्षण खत्म करने” या “आरक्षण व्यवस्था बदलने” के फैसले के तौर पर देखना सही नहीं होगा।

वर्तमान में EWS के लिए अलग संवैधानिक प्रावधान मौजूद है और आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान लागू है। प्रस्तावित आयोग की मांग मुख्य रूप से सामान्य वर्ग के हितों और समस्याओं के लिए एक संस्थागत मंच बनाने की है।

सवर्ण संगठनों की मांग से बढ़ी राजनीतिक हलचल

उत्तर प्रदेश में हाल के दिनों में सवर्ण संगठनों की गतिविधियां बढ़ी हैं। कासगंज में सवर्ण समाज के लोगों ने राष्ट्रीय स्तर पर अधिकार-संपन्न सवर्ण आयोग बनाने और आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा समेत कई मांगों को लेकर प्रदर्शन किया।

सिद्धार्थनगर में भी प्रदर्शनकारियों ने सभी वर्गों के लिए आर्थिक आधार पर आरक्षण और सवर्ण आयोग की मांग उठाई।

ऐसे में दिल्ली में BJP सांसदों की ओर से केंद्रीय सवर्ण आयोग की मांग उठना इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम को और महत्वपूर्ण बना देता है।

अब नजर केंद्र सरकार के रुख पर

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या केंद्र सरकार राष्ट्रीय सवर्ण आयोग के गठन पर कोई औपचारिक पहल करेगी?

क्या सरकार इस मांग पर अध्ययन के लिए कोई समिति बनाएगी, क्या मौजूदा EWS व्यवस्था में बदलाव किए जाएंगे या क्या सामान्य वर्ग के लिए नई कल्याणकारी योजनाएं लाई जाएंगी—इन सवालों का जवाब आने वाले समय में मिलेगा।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले यदि केंद्र इस दिशा में कोई बड़ा कदम उठाता है, तो इसका असर राज्य की सामाजिक और राजनीतिक बहस पर पड़ सकता है।

निष्कर्ष

केंद्रीय सवर्ण आयोग की मांग अब केवल सामाजिक संगठनों तक सीमित नहीं रही है। BJP के कुछ सांसदों द्वारा वरिष्ठ केंद्रीय नेताओं से मुलाकात के बाद इस मुद्दे ने दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश तक राजनीतिक चर्चा को तेज कर दिया है। बिहार का सवर्ण आयोग इस मांग के लिए एक मॉडल के तौर पर पेश किया जा रहा है।

लेकिन अभी यह मांग है, केंद्र सरकार का घोषित फैसला नहीं। इसलिए आने वाले दिनों में सबसे महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाती है और क्या इसे राष्ट्रीय स्तर पर संस्थागत रूप देने की दिशा में कोई कदम उठाया जाता है।

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