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सुभाष चंद्रा की कर्ज की कहानी: ₹22,000 करोड़ के दावे से ₹6.5 करोड़ के भुगतान तक कैसे पहुंचा मामला?

Subhash Chandra Insolvency Case: Zee Group के संस्थापक सुभाष चंद्रा के personal insolvency मामले में ₹22,006 करोड़ के दावों के मुकाबले करीब ₹6.5 करोड़ के repayment plan पर विवाद है। जानें पूरा मामला।

नई दिल्ली: जी ग्रुप के संस्थापक और एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्रा का व्यक्तिगत दिवालियापन मामला इन दिनों देश के कॉरपोरेट और बैंकिंग जगत में चर्चा का विषय बना हुआ है। मामला केवल एक कारोबारी समूह के कर्ज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्सनल गारंटी, बैंकों की रिकवरी और भारत की Insolvency प्रक्रिया से जुड़े कई बड़े सवाल खड़े करता है।

राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) के 25 अगस्त के आदेश में सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवालियापन कार्यवाही में करीब ₹6.5 करोड़ के रिपेमेंट प्लान को मंजूरी दी गई थी, जबकि इस मामले में करीब ₹22,006.57 करोड़ के दावे सामने आए थे। हालांकि, इसके बाद NCLT की पांच सदस्यीय विशेष पीठ ने इस आदेश पर रोक लगाकर मामले की दोबारा सुनवाई का फैसला किया है।

सुभाष चंद्रा पर इतना बड़ा कर्ज कैसे आया?

सुभाष चंद्रा ने मीडिया कारोबार से निकलकर कई दूसरे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर विस्तार किया। एस्सेल ग्रुप ने इंफ्रास्ट्रक्चर, हाईवे, पावर ट्रांसमिशन और सोलर एनर्जी जैसे पूंजी-गहन कारोबारों में प्रवेश किया। इन परियोजनाओं के लिए बड़ी मात्रा में पूंजी की जरूरत थी और रिटर्न आने में लंबा समय लग सकता था।

समूह की कंपनियों की फंडिंग के लिए सुभाष चंद्रा ने अपनी प्रमुख संपत्ति यानी Zee Entertainment Enterprises (ZEEL) में प्रमोटर हिस्सेदारी के शेयरों को भी गिरवी रखा। बाद में शेयर कीमतों में गिरावट आने से कर्ज का दबाव और बढ़ गया।

2019 में खुलकर सामने आया कर्ज संकट

साल 2019 की शुरुआत में एस्सेल ग्रुप पर करीब ₹45,000 करोड़ के कुल उधार का संकट सामने आया। जनवरी 2019 में ग्रुप से जुड़ी एक कंपनी को लेकर सामने आई खबरों के बाद शेयर बाजार में भारी दबाव बना।

ZEEL के शेयर में एक समय 26 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई, जबकि Dish TV का शेयर करीब 33 फीसदी तक टूट गया। गिरवी रखे शेयरों की कीमत घटने के बाद कर्जदाताओं ने अतिरिक्त सुरक्षा या भुगतान की मांग की। स्थिति बिगड़ने पर गिरवी शेयरों की बिक्री ने दबाव को और बढ़ाया।

पर्सनल गारंटी बनी सबसे बड़ी परेशानी

इस पूरे मामले में सबसे अहम शब्द है Personal Guarantee यानी व्यक्तिगत गारंटी।

जब कोई प्रमोटर कंपनी के कर्ज के लिए व्यक्तिगत गारंटी देता है और संबंधित कंपनी कर्ज चुकाने में डिफॉल्ट करती है, तो निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत कर्जदाता गारंटर से भी वसूली की कार्रवाई कर सकता है। सुभाष चंद्रा के मामले में भी दिवालियापन प्रक्रिया एस्सेल ग्रुप से जुड़ी कंपनियों के लिए दी गई व्यक्तिगत गारंटी से संबंधित है।

व्यक्तिगत दिवालियापन की यह कार्यवाही 2024 में Indiabulls Housing Finance की याचिका के बाद शुरू हुई थी। यह Zee Entertainment की कॉरपोरेट insolvency प्रक्रिया से अलग मामला है।

₹22,006 करोड़ का दावा, लेकिन भुगतान करीब ₹6.5 करोड़

मामले का सबसे विवादित पहलू कर्ज और प्रस्तावित भुगतान के बीच का विशाल अंतर है। NCLT के पहले आदेश में करीब ₹6.25 करोड़ के भुगतान वाले प्लान को मंजूरी दी गई थी, जबकि कुल admitted claims करीब ₹22,006.57 करोड़ बताए गए। दूसरे विश्लेषण में सुभाष चंद्रा के व्यक्तिगत गारंटर के तौर पर आपत्तिकर्ताओं का दावा करीब ₹3,992 करोड़ बताया गया है।

यही अंतर इस मामले को बेहद पेचीदा बनाता है। सुभाष चंद्रा के पक्ष का कहना है कि ₹22,000 करोड़ की पूरी राशि उनकी व्यक्तिगत देनदारी नहीं है, बल्कि यह उन कंपनियों से जुड़े दावों का आंकड़ा है जिनके कर्ज के लिए उन्होंने गारंटी दी थी।

सुभाष चंद्रा ने अपनी संपत्ति को लेकर क्या कहा?

सुभाष चंद्रा के कार्यालय की ओर से जारी बयान के अनुसार, उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर किसी कर्जदाता से पैसा उधार नहीं लिया था और वे केवल Personal Guarantor थे। बयान में यह भी कहा गया कि 2016 में संसद में घोषित उनकी कुल संपत्ति ₹39.08 करोड़ थी।

उनके कार्यालय ने सवाल उठाया कि 2017 में उनकी नेटवर्थ करीब ₹45,888 करोड़ कैसे मानी गई। 2024 में उनकी घोषित व्यक्तिगत नेटवर्थ करीब ₹31.79 करोड़ बताई गई, जिसमें करीब ₹25 करोड़ का एक आवासीय मकान भी शामिल है।

बैंकों ने उठाए संपत्ति की जांच पर सवाल

कर्जदाताओं ने इतनी कम रिकवरी को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराईं। उनका सवाल था कि सुभाष चंद्रा की वित्तीय स्थिति और संपत्तियों की पर्याप्त जांच हुई या नहीं। कुछ कर्जदाताओं ने forensic investigation और asset tracing की जरूरत भी उठाई।

हालांकि, NCLT ने कहा कि उपलब्ध पुराने नेटवर्थ प्रमाणपत्र अपने आप में संपत्ति छिपाने या डायवर्ट करने का प्रमाण नहीं हैं और किसी repayment plan को मंजूरी देने से पहले forensic audit अनिवार्य शर्त नहीं है।

किन बैंकों और वित्तीय संस्थानों का पैसा फंसा?

मामले में कई बड़े बैंक और वित्तीय संस्थान कर्जदाताओं के रूप में सामने आए हैं। उपलब्ध विवरण के अनुसार इनमें HDFC Bank, LIC Housing Finance, IndusInd Bank, Canara Bank, Union Bank, RBL Bank, Franklin Templeton और Edelweiss शामिल हैं।

बताए गए exposure में LIC Housing Finance का करीब ₹1,322 करोड़, HDFC Bank का ₹775 करोड़, Franklin Templeton का ₹729 करोड़ और Edelweiss का ₹565 करोड़ शामिल है।

Repayment Plan को 80.81% वोटिंग सपोर्ट कैसे मिला?

NCLT के पहले आदेश के मुताबिक repayment plan को करीब 80.81% वोटिंग शेयर का समर्थन मिला था, जबकि विरोध करने वाले बैंकों के पास करीब 19.186% वोटिंग शेयर था।

इसी आधार पर पहले ट्रिब्यूनल ने माना कि निर्धारित प्रक्रिया के तहत कर्जदाताओं की मंजूरी मिलने के बाद tribunal को सामान्य तौर पर उनकी commercial decision-making की जगह अपनी राय नहीं रखनी चाहिए।

फिर NCLT ने अपने ही आदेश पर क्यों लगाई रोक?

मामले ने नया मोड़ तब लिया जब NCLT की पांच सदस्यीय विशेष पीठ ने 25 अगस्त के आदेश के संचालन पर रोक लगा दी। पीठ ने कहा कि पहले के फैसलों में स्पष्ट बहुमत नहीं था और मामले की दोबारा सुनवाई की जाएगी।

साथ ही सुभाष चंद्रा को गारंटर के तौर पर अपनी किसी भी संपत्ति को बेचने, ट्रांसफर करने या किसी अन्य तरीके से dispose करने से रोक दिया गया है। सभी संबंधित पक्षों को नोटिस भी जारी किए गए हैं।

सुभाष चंद्रा की कारोबारी यात्रा से जुड़ा बड़ा सबक

सुभाष चंद्रा की कहानी भारतीय मीडिया और कारोबारी इतिहास में बेहद महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने 1990 के दशक में Zee TV के जरिए भारत के निजी सैटेलाइट टेलीविजन बाजार में बड़ा बदलाव किया।

लेकिन बाद के वर्षों में मीडिया से बाहर कई पूंजी-गहन क्षेत्रों में तेजी से विस्तार, भारी उधारी और गिरवी शेयरों पर निर्भरता ने समूह की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ाया। Aaj Tak की रिपोर्ट के मुताबिक, यही कर्ज संकट आगे चलकर व्यक्तिगत गारंटी के स्तर तक पहुंच गया।

यह मामला बैंकों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

सुभाष चंद्रा का मामला केवल एक कारोबारी की वित्तीय मुश्किलों का मामला नहीं है। इससे यह सवाल भी सामने आता है कि बड़े कॉरपोरेट कर्ज देते समय Promoter Personal Guarantee को किस तरह आंका जाए।

किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत गारंटी हजारों करोड़ रुपये की देनदारी के सामने तभी प्रभावी सुरक्षा बन सकती है जब उसके पास वास्तव में पर्याप्त और कानूनी रूप से वसूली योग्य संपत्ति हो।

अब आगे क्या होगा?

NCLT की पांच सदस्यीय विशेष पीठ द्वारा पहले आदेश पर रोक के बाद अब repayment plan की दोबारा सुनवाई होगी। इसके अलावा सुभाष चंद्रा की संपत्तियों के निपटान पर लगी रोक भी मामले को आगे की कानूनी प्रक्रिया तक महत्वपूर्ण बनाती है।

इसलिए फिलहाल ₹6.5 करोड़ के repayment plan को अंतिम परिणाम मानना सही नहीं होगा। मामले में आगे NCLT की सुनवाई और संभावित अपील के बाद तस्वीर और स्पष्ट होगी।

निष्कर्ष

सुभाष चंद्रा का insolvency मामला दिखाता है कि तेज कारोबारी विस्तार और भारी कर्ज के साथ जोखिम कितना बढ़ सकता है। एक तरफ हजारों करोड़ रुपये के दावों का आंकड़ा है, दूसरी तरफ कुछ करोड़ रुपये के repayment plan ने बैंकों की रिकवरी और insolvency व्यवस्था पर गंभीर बहस छेड़ दी है।

अब NCLT की पांच सदस्यीय विशेष पीठ की दोबारा सुनवाई इस मामले की अगली दिशा तय करेगी। साथ ही यह मामला भारत में personal insolvency, promoter guarantees और creditor recovery के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।

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