Breaking Newsराजनीतिक

पंजाब कांग्रेस में अंदरूनी उठापटक: बघेल कैसे बने सियासी खींचतान का शिकार, क्या बदलेगा प्रदेश अध्यक्ष?

भूपेश बघेल को पंजाब प्रभारी पद से हटाकर सचिन पायलट को जिम्मेदारी देने के बाद कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष को लेकर फिर हलचल तेज हो गई है। राजा वडिंग को लेकर पार्टी के भीतर विरोध और नेतृत्व परिवर्तन की मांग ने आलाकमान के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है।

दीपक झा

दिल्ली: पंजाब कांग्रेस में लंबे समय से जारी अंदरूनी खींचतान अब पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बनती दिखाई दे रही है। 2025 की शुरुआत में भूपेश बघेल को पंजाब का प्रभारी बनाए जाने के बाद से ही प्रदेश संगठन में अलग-अलग गुटों के बीच मतभेद सामने आते रहे। अब बघेल की जगह सचिन पायलट को पंजाब का नया प्रभारी बनाए जाने के बाद प्रदेश अध्यक्ष को लेकर सियासी हलचल एक बार फिर तेज हो गई है।

राजा वडिंग को लेकर क्यों बढ़ा विवाद?

कांग्रेस आलाकमान ने शुरुआत में प्रदेश अध्यक्ष राजा वडिंग को पद पर बनाए रखने का रुख अपनाया था। पार्टी संगठन का बड़ा हिस्सा वडिंग के इर्द-गिर्द केंद्रित था। वहीं विधायक दल के नेता प्रताप सिंह बाजवा और राजा वडिंग के एक ही समुदाय से होने का मुद्दा भी पार्टी के भीतर चर्चा में रहा।

इसी दौरान पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने की मांग जोर पकड़ने लगी। चन्नी के समर्थकों की ओर से पत्र लिखे गए और माकन कमेटी के सर्वे में भी उनके पक्ष में सिफारिश किए जाने की बात सामने आई। इसके बावजूद 1 जुलाई को कांग्रेस ने राजा वडिंग को ही प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखने का फैसला किया। इससे चन्नी खेमे में नाराजगी बढ़ी और उनके समर्थकों ने वडिंग का विरोध शुरू कर दिया।

बघेल की भूमिका पर क्यों उठे सवाल?

भूपेश बघेल ने नाराज नेताओं को साथ लाने और मनाने की कोशिश की, लेकिन उनकी भूमिका धीरे-धीरे राजा वडिंग के संरक्षक के तौर पर देखी जाने लगी। इससे पार्टी के भीतर उनके खिलाफ भी प्रतिरोध की स्थिति बनी। आखिरकार बघेल को पंजाब से हटाकर असम का प्रभारी बनाया गया और सचिन पायलट को पंजाब की जिम्मेदारी सौंप दी गई।

चन्नी के पक्ष में माहौल के बावजूद फैसला क्यों नहीं बदला?

चरणजीत सिंह चन्नी के प्रदेश अध्यक्ष बनने की मांग के बावजूद कई कारणों से कांग्रेस आलाकमान ने राजा वडिंग को बनाए रखा। स्रोत के अनुसार इनमें दलित वोटों के विभाजन की आशंका, चन्नी के खिलाफ चल रहे ईडी मामलों को लेकर आलाकमान की अनिश्चितता और हिमाचल का प्रभारी बनने के प्रस्ताव को ठुकराना शामिल रहा। प्रचार समिति की जिम्मेदारी मिलने के बाद भी चन्नी खेमे का विरोध जारी रहा।

सचिन पायलट के सामने सबसे बड़ी चुनौती

अब पंजाब कांग्रेस की कमान सचिन पायलट के हाथ में है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग गुटों के बीच संतुलन बनाना और पार्टी के बड़े नेताओं को एक मंच पर लाना है।

सवाल यह है कि क्या पायलट राजा वडिंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखते हुए चन्नी, प्रताप सिंह बाजवा, सुखजिंदर सिंह रंधावा और अन्य नेताओं को साथ ला पाएंगे? प्रताप सिंह बाजवा, विजय इन्द्र सिंगला और रंधावा जैसे नाम संभावित विकल्प के तौर पर चर्चा में हैं।

पंजाब कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई का चुनाव पर असर

पंजाब कांग्रेस का मौजूदा संकट केवल नेताओं की व्यक्तिगत खींचतान तक सीमित नहीं है। इसके पीछे सत्ता-संरचना, संगठन में प्रभाव, जातीय समीकरण और व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं भी अहम कारक हैं। यही वजह है कि नेतृत्व को लेकर जारी विवाद पार्टी की चुनावी तैयारी को प्रभावित कर सकता है।

चन्नी का मामला भी कांग्रेस के सामने एक जटिल स्थिति पेश करता है। एक ओर वह पार्टी के प्रमुख दलित चेहरों में शामिल हैं, वहीं 2022 में उन्हें दो सीटों पर हार का सामना करना पड़ा था। दूसरी ओर राजा वडिंग की संगठन में पकड़ और लोकसभा चुनाव में जीत ने उनकी स्थिति को मजबूत किया है।

क्या राजा वडिंग की विदाई तय है?

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि सचिन पायलट के प्रभारी बनने के बाद क्या राजा वडिंग को प्रदेश अध्यक्ष पद पर बनाए रखा जाएगा या कांग्रेस नेतृत्व परिवर्तन का फैसला करेगा।

अगर पायलट राजा वडिंग को बरकरार रखते हुए चन्नी, बाजवा और रंधावा जैसे नेताओं को साथ लाने में सफल होते हैं, तो संगठन में संतुलन बनाने की कोशिश कामयाब हो सकती है। लेकिन अगर गुटबाजी जारी रहती है, तो प्रदेश अध्यक्ष बदलने का दबाव और बढ़ सकता है।

चुनावी तैयारी के लिए कांग्रेस के पास सीमित समय है। ऐसे में पार्टी के सामने सबसे बड़ी जरूरत अंदरूनी मतभेद खत्म कर संगठन को एकजुट करने की है। पंजाब में आम आदमी पार्टी, अकाली दल और बीजेपी जैसी राजनीतिक ताकतों के बीच कांग्रेस के लिए संगठनात्मक एकता उसकी चुनावी रणनीति का अहम आधार बन सकती है।

निष्कर्ष

पंजाब कांग्रेस में प्रभारी बदलने के बाद भी प्रदेश अध्यक्ष को लेकर विवाद खत्म नहीं हुआ है। भूपेश बघेल की जगह सचिन पायलट की नियुक्ति से आलाकमान ने संतुलन बनाने की कोशिश की है, लेकिन राजा वडिंग और उनके विरोधी खेमे के बीच टकराव अभी चुनौती बना हुआ है।

अब निगाहें सचिन पायलट की रणनीति और कांग्रेस आलाकमान के अगले फैसले पर हैं। आने वाले समय में यह तय होगा कि पार्टी मौजूदा नेतृत्व के साथ आगे बढ़ती है या पंजाब कांग्रेस में एक और बड़ा संगठनात्मक बदलाव किया जाता है।

Related Articles

Back to top button