होर्मुज और लाल सागर से बढ़ा भारत पर दोहरा खतरा! तेल 135 डॉलर पहुंचा तो महंगाई से लेकर कारोबार तक सब पर पड़ेगा असर
भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है। केयरएज रेटिंग्स (CareEdge Ratings) की एक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और लाल सागर (बाब-अल-मंडेब जलडमरूमध्य) दोनों समुद्री मार्ग एक साथ बाधित होते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत 130 से 135 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। इसका सीधा असर भारत के तेल आयात, महंगाई, रुपये और व्यापार पर पड़ सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक भारत अपने कच्चे तेल का करीब 40 प्रतिशत आयात स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जरिए करता है। इसके अलावा एलएनजी (LNG) और एलपीजी (LPG) की बड़ी मात्रा भी इसी समुद्री मार्ग से भारत पहुंचती है।
केयरएज रेटिंग्स का कहना है कि यदि होर्मुज और लाल सागर दोनों क्षेत्रों में एक साथ बाधाएं आती हैं, तो भारत की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है और तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल सकता है।
मार्च 2026 से बना हुआ है संकट
रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम एशिया में मार्च 2026 से जारी तनाव ने पहले ही वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव बना रखा है। हालांकि भारत ने रूस समेत अन्य देशों से विविध स्रोतों के जरिए तेल खरीदकर आपूर्ति बनाए रखने की कोशिश की है, लेकिन समुद्री मार्गों पर बढ़ते जोखिम ने नई चुनौतियां पैदा कर दी हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि युद्ध संबंधी जोखिम बढ़ने के बाद जहाजों के वार-रिस्क इंश्योरेंस प्रीमियम में 1,000 प्रतिशत तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे परिवहन लागत भी बढ़ रही है।
हूती हमलों ने बढ़ाई मुश्किल
रिपोर्ट में यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा लाल सागर में जहाजों पर किए जा रहे हमलों का भी जिक्र किया गया है। इसमें कहा गया है कि यदि क्षेत्रीय तनाव और बढ़ता है तथा बाब-अल-मंडेब जलडमरूमध्य प्रभावित होता है, तो एशिया और यूरोप के बीच समुद्री व्यापार पर बड़ा असर पड़ सकता है।
हालांकि, भविष्य की संभावित सैन्य या भू-राजनीतिक घटनाओं को लेकर रिपोर्ट में व्यक्त आकलन अनुमान आधारित हैं और उनका परिणाम परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
दो अहम समुद्री रास्ते क्यों हैं इतने महत्वपूर्ण?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है। दुनिया के कुल तेल उपभोग का लगभग 20 प्रतिशत और वैश्विक एलएनजी आपूर्ति का करीब एक-तिहाई हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है।
वहीं बाब-अल-मंडेब जलडमरूमध्य हिंद महासागर को लाल सागर और स्वेज नहर से जोड़ता है। यह एशिया और यूरोप के बीच समुद्री व्यापार का सबसे अहम मार्ग माना जाता है।
भारत के व्यापार और महंगाई पर पड़ सकता है असर
रिपोर्ट के अनुसार भारत के लगभग 50 प्रतिशत निर्यात और 30 प्रतिशत आयात का संबंध लाल सागर मार्ग से है। यदि इस रास्ते पर लंबी अवधि तक व्यवधान बना रहता है तो व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से भारत का आयात बिल बढ़ेगा, चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बढ़ सकता है और रुपये पर दबाव बन सकता है। इसके साथ ही महंगाई में भी बढ़ोतरी की आशंका जताई गई है।
यदि जहाजों को केप ऑफ गुड होप के रास्ते भेजना पड़ा तो डिलीवरी में 2 से 3 सप्ताह तक की अतिरिक्त देरी हो सकती है, जिससे माल ढुलाई की लागत और बढ़ जाएगी।
किन सेक्टरों पर सबसे ज्यादा असर?
केयरएज रेटिंग्स के मुताबिक यदि यह संकट गहराता है तो कच्चा तेल, एलपीजी, उर्वरक, विमानन, प्लास्टिक पैकेजिंग और बासमती चावल जैसे क्षेत्रों पर सबसे अधिक दबाव पड़ सकता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बड़ी कंपनियां कुछ हद तक बढ़ी लागत का सामना कर सकती हैं, लेकिन सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSMEs) के लिए कार्यशील पूंजी जुटाना और मुनाफा बनाए रखना अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
फिलहाल यह आकलन संभावित जोखिमों पर आधारित है। आने वाले समय में पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति और प्रमुख समुद्री मार्गों पर हालात तय करेंगे कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर इसका वास्तविक प्रभाव कितना पड़ता है।



