आपका तकिया ही बन रहा है गर्दन दर्द की वजह? हर 2 साल में बदलने की सलाह क्यों देते हैं विशेषज्ञ
अगर सुबह उठते ही गर्दन में दर्द, कंधों में जकड़न, बार-बार छींक आना या आंखों में जलन महसूस होती है, तो इसकी वजह सिर्फ गलत सोने की मुद्रा नहीं, बल्कि आपका पुराना तकिया भी हो सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि समय के साथ तकिए में धूल, डस्ट माइट्स, बैक्टीरिया और नमी जमा होने लगती है, जिससे नींद की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि कई विशेषज्ञ हर 1 से 2 साल में तकिया बदलने की सलाह देते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, रोजाना इस्तेमाल होने वाला तकिया समय के साथ अपना आकार और मजबूती खो देता है। जब तकिया सिर और गर्दन को सही सपोर्ट नहीं दे पाता, तो रीढ़ की हड्डी का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ सकता है। इसका असर गर्दन, कंधों और ऊपरी पीठ पर पड़ता है, जिससे सुबह उठने पर दर्द या अकड़न महसूस हो सकती है।
तकिए में जमा हो सकते हैं डस्ट माइट्स और बैक्टीरिया
नींद के दौरान शरीर से निकलने वाला पसीना, त्वचा की मृत कोशिकाएं और नमी तकिए में जमा होती रहती हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि यही वातावरण डस्ट माइट्स (Dust Mites) और कुछ प्रकार के बैक्टीरिया के पनपने के लिए अनुकूल बन सकता है। जिन लोगों को एलर्जी या अस्थमा की समस्या है, उनमें इससे छींक, नाक बंद होना, आंखों में खुजली और सांस संबंधी परेशानी बढ़ सकती है।
नींद की गुणवत्ता पर भी पड़ता है असर
स्लीप एक्सपर्ट्स के मुताबिक, सही तकिया गहरी और आरामदायक नींद के लिए बेहद जरूरी है। यदि तकिया बहुत ऊंचा, बहुत पतला या दब चुका हो, तो रातभर शरीर बार-बार करवट बदलता है। इससे नींद पूरी नहीं हो पाती और सुबह थकान, सिरदर्द या शरीर में भारीपन महसूस हो सकता है। लंबे समय तक खराब नींद का असर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों पर पड़ सकता है।
हर 2 साल में तकिया बदलने की सलाह क्यों?
विशेषज्ञों के अनुसार, ज्यादातर सामान्य तकियों की उपयोगी उम्र लगभग 1 से 2 साल होती है। इसके बाद उनमें धूल, नमी और सूक्ष्म कण जमा होने लगते हैं, जबकि उनका आकार और सपोर्ट भी कम हो जाता है। हालांकि, तकिया कब बदलना है यह उसकी गुणवत्ता, इस्तेमाल और देखभाल पर भी निर्भर करता है। यदि तकिया दब गया हो, गांठदार हो गया हो या सिर और गर्दन को ठीक से सहारा न दे रहा हो, तो उसे बदल देना बेहतर माना जाता है।
कैसे चुनें सही तकिया?
ऑर्थोपेडिक और स्लीप विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि तकिया ऐसा होना चाहिए जो गर्दन और रीढ़ को एक सीध में रखने में मदद करे। जो लोग पीठ के बल सोते हैं, उनके लिए मध्यम ऊंचाई वाला तकिया बेहतर माना जाता है। करवट लेकर सोने वालों को थोड़ा मोटा तकिया अधिक आरामदायक हो सकता है, जबकि पेट के बल सोने वालों के लिए पतला तकिया या बिना तकिए के सोना कई मामलों में बेहतर माना जाता है। यदि पहले से गर्दन या सर्वाइकल की समस्या है, तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार तकिया चुनना चाहिए।
तकिए की सफाई भी है उतनी ही जरूरी
विशेषज्ञों के मुताबिक, तकिए के कवर को सप्ताह में कम से कम एक बार धोना चाहिए। यदि तकिया धोने योग्य है तो निर्माता के निर्देशों के अनुसार समय-समय पर उसकी सफाई भी करनी चाहिए। तकिए को धूप में रखने से नमी कम करने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा, तकिए को मोड़ने पर यदि वह अपनी मूल स्थिति में वापस नहीं आता, तो यह संकेत हो सकता है कि उसे बदलने का समय आ गया है।
किन लोगों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए?
डॉक्टरों के अनुसार, जिन लोगों को सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस, गर्दन का पुराना दर्द, अस्थमा, एलर्जी या साइनस की समस्या है, उन्हें तकिए की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देना चाहिए। यदि सुबह उठते ही लगातार गर्दन दर्द, सिरदर्द, छींक या आंखों में जलन जैसी समस्या बनी रहती है, तो केवल दवा लेने के बजाय अपने तकिए की स्थिति भी जांचें। सही तकिया, नियमित सफाई और समय पर बदलाव अच्छी नींद के साथ-साथ गर्दन और रीढ़ की सेहत बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।



