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कोई भूमिका नहीं’: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पूर्व CM के स्टिंग से जुड़े वसूली केस को किया खारिज

2018 के एक्सटॉर्शन और क्रिमिनल कॉन्सपिरेसी मामले में आरोपी व्यक्ति को राहत; कोर्ट ने कहा- FIR में धमकी, पैसे की मांग या अपराध में भागीदारी का कोई विशिष्ट आरोप नहीं

अजय विक्रम सिंह

देहरादून। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से जुड़े प्रस्तावित स्टिंग ऑपरेशन के मामले में एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज 2018 के एक्सटॉर्शन और क्रिमिनल कॉन्सपिरेसी केस को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि FIR में आरोपी की कोई विशिष्ट भूमिका नहीं बताई गई थी और जांच के दौरान भी उसके खिलाफ कोई आपत्तिजनक सामग्री नहीं मिली।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला वर्ष 2018 में देहरादून के राजपुर थाने में दर्ज FIR से जुड़ा है। FIR एक न्यूज चैनल के रिपोर्टर ने दर्ज कराई थी। रिपोर्टर के अनुसार, चैनल के CEO ने उसे तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत पर स्टिंग ऑपरेशन करने का जिम्मा दिया था। आरोपी व्यक्ति का नाम इस संदर्भ में सामने आया था कि वह मुख्यमंत्री से मुलाकात के लिए रिपोर्टर की मदद कर सकता है।

रिपोर्टर ने मुख्यमंत्री से मुलाकात तो की, लेकिन आशंकित होने के कारण स्टिंग ऑपरेशन नहीं किया। इसके बाद उसने आरोप लगाया कि यदि वह स्टिंग नहीं करता है तो चैनल के CEO और याचिकाकर्ता ने उसका करियर बर्बाद करने और जान से मारने की धमकी दी थी।

हाईकोर्ट ने क्यों खारिज किया केस?

जस्टिस आलोक महरा ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि आरोपी के खिलाफ कोई प्रत्यक्ष आरोप नहीं है कि उसने रिपोर्टर को धमकाया, डराया या उससे पैसे की मांग की।

कोर्ट ने कहा कि केवल FIR में किसी व्यक्ति का नाम होना पर्याप्त नहीं है। आरोपी के खिलाफ किसी ऐसे विशिष्ट प्रत्यक्ष कृत्य (specific overt act) का उल्लेख होना चाहिए, जिससे संबंधित अपराध के आवश्यक तत्व सामने आते हों।

कोर्ट के मुताबिक, CEO द्वारा रिपोर्टर को यह बताया जाना कि याचिकाकर्ता मुख्यमंत्री से मुलाकात कराने में मदद कर सकता है, अपने आप में एक्सटॉर्शन या आपराधिक साजिश के अपराध को स्थापित नहीं करता।

IPC की धारा 386 और 388 का भी जिक्र

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि FIR में ऐसे कोई विशिष्ट कृत्य सामने नहीं आते, जिनसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 386 या 388 के तहत एक्सटॉर्शन का मामला बनता हो। कोर्ट ने 8 सितंबर को यह आदेश दिया।

अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी को केवल उसके नाम के FIR में उल्लेख के आधार पर आपराधिक कार्यवाही की अनिश्चितता और कठिनाई का सामना करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, जब उसके खिलाफ प्रथम दृष्टया कोई सामग्री उपलब्ध न हो।

जांच में भी नहीं मिला आपत्तिजनक सबूत

मामले की जांच के दौरान कुल 10 जांच अधिकारियों ने जांच की। इसके बावजूद याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई आपत्तिजनक सामग्री नहीं मिली। राज्य की ओर से पेश अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता अक्षय लटवाल ने भी अदालत के समक्ष स्वीकार किया कि आरोपी के खिलाफ कोई incriminating material नहीं मिला था।

जांच के बाद चैनल के CEO और एक अन्य व्यक्ति के खिलाफ 25 मार्च 2019 को चार्जशीट दाखिल की गई थी। याचिकाकर्ता को चार्जशीट में आरोपी नहीं बनाया गया था।

हाईकोर्ट की टिप्पणी

अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल किसी व्यक्ति को मुख्यमंत्री से मुलाकात कराने में मदद करने से उसके खिलाफ एक्सटॉर्शन या आपराधिक साजिश का मामला नहीं बनता। जब न धमकी का आरोप हो, न पैसे की मांग का और न ही कथित साजिश में भागीदारी का कोई प्रथम दृष्टया सबूत हो, तो आपराधिक कार्यवाही जारी रखने का उचित आधार नहीं है।

क्या है फैसले का महत्व?

इस फैसले में हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि किसी व्यक्ति को केवल FIR में नाम आने के आधार पर लंबे समय तक आपराधिक मुकदमे का सामना करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब जांच में उसके खिलाफ कोई प्रथम दृष्टया आपत्तिजनक सामग्री सामने न आई हो। अदालत ने इसी आधार पर याचिकाकर्ता के खिलाफ कार्यवाही समाप्त कर दी।

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