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झीरम घाटी हत्याकांड: 13 साल बाद फैसले का इंतजार, 5 सितंबर को NIA कोर्ट सुनाएगी फैसला

अजय विक्रम सिंह

रायपुर/जगदलपुर: छत्तीसगढ़ के चर्चित झीरम घाटी नक्सली हमले के मामले में 13 साल से चल रही न्यायिक प्रक्रिया अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। जगदलपुर स्थित विशेष NIA अदालत ने मामले में फैसला 5 सितंबर 2026 तक टाल दिया है। पहले फैसला 31 अगस्त को सुनाया जाना था। अंतिम बहस पूरी होने के बाद अब पीड़ित परिवारों, राजनीतिक दलों और पूरे बस्तर की नजर अदालत के फैसले पर है।

25 मई 2013 को हुआ था हमला

25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा का काफिला सुकमा से लौट रहा था। इसी दौरान बस्तर के झीरम घाटी इलाके में माओवादियों ने घात लगाकर काफिले पर हमला कर दिया।

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के आधिकारिक केस रिकॉर्ड के अनुसार, हमले में 27 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें 10 पुलिसकर्मी शामिल थे, जबकि 38 लोग घायल हुए थे। NIA के मुताबिक हमले के दौरान हथियार और गोला-बारूद भी लूटा गया था।

हालिया रिपोर्टों में मृतकों की संख्या 29 से 31 तक बताई गई है, क्योंकि अलग-अलग रिपोर्टों में तत्काल और बाद में उपचार के दौरान हुई मौतों को अलग-अलग तरीके से गिना गया है।

कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की हुई थी हत्या

झीरम घाटी हमला उस समय के छत्तीसगढ़ कांग्रेस नेतृत्व के लिए बेहद बड़ी त्रासदी था। हमले में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, वरिष्ठ नेता महेंद्र कर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल और कांग्रेस नेता उदय मुदलियार समेत कई लोग मारे गए थे।

महेंद्र कर्मा को इस हमले का प्रमुख निशाना माना जाता रहा है। वह नक्सल विरोधी नागरिक आंदोलन सलवा जुडूम के संस्थापक थे।

NIA ने दो दिन बाद संभाली थी जांच

हमले के बाद केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के आदेश पर NIA ने 27 मई 2013 को जांच अपने हाथ में ली। एजेंसी ने सितंबर 2014 में नौ गिरफ्तार आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। इसके बाद सितंबर 2015 में सप्लीमेंट्री चार्जशीट भी दाखिल की गई। मामला जगदलपुर की विशेष NIA अदालत में चलता रहा।

लंबी सुनवाई के दौरान 101 गवाहों के बयान दर्ज किए गए। अंतिम बहस अगस्त 2026 में पूरी हुई और अदालत ने फैसला सुनाने की तारीख तय की थी। बाद में फैसला 5 सितंबर तक टाल दिया गया।

13 साल बाद भी बड़ा सवाल—क्या पूरी साजिश सामने आएगी?

झीरम घाटी मामले में सिर्फ हमले को अंजाम देने वालों की पहचान ही नहीं, बल्कि इसके पीछे की बड़ी साजिश को लेकर भी वर्षों से राजनीतिक विवाद रहा है।

कांग्रेस नेताओं और पीड़ित परिवारों का आरोप रहा है कि NIA जांच में हमले की व्यापक साजिश का पूरा खुलासा नहीं हुआ। दूसरी ओर, जांच एजेंसी की ओर से मामले में आरोपियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की गई और फरार आरोपियों के संबंध में आगे की जांच जारी रहने की बात कही गई है।

कांग्रेस सरकार ने बनाई थी SIT

2018 में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार बनने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने झीरम घाटी हमले की कथित बड़ी साजिश की जांच के लिए SIT गठित की थी।

इसके बाद 2020 में हत्या और आपराधिक साजिश से जुड़ी धाराओं में अज्ञात लोगों के खिलाफ नई FIR भी दर्ज की गई। NIA ने इस नई जांच को अपने पास ट्रांसफर कराने की कोशिश की, लेकिन मामला आगे बढ़कर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने के बावजूद शीर्ष अदालत ने इसमें हस्तक्षेप नहीं किया।

BJP और कांग्रेस में जारी रहा राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप

झीरम घाटी मामला छत्तीसगढ़ की राजनीति में भी लंबे समय से संवेदनशील मुद्दा रहा है। कांग्रेस ने जहां बड़ी साजिश की जांच पूरी नहीं होने का आरोप लगाया, वहीं बीजेपी नेताओं ने कांग्रेस के आरोपों पर सवाल उठाए हैं।

फैसले की तारीख नजदीक आने के साथ राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने बस्तर में माओवादी हिंसा में जान गंवाने वाले नागरिकों, जनप्रतिनिधियों और सुरक्षाकर्मियों को याद करते हुए नक्सल हिंसा की आलोचना की है।

पीड़ित परिवारों को न्याय का इंतजार

झीरम घाटी हमले को 13 साल बीत चुके हैं, लेकिन पीड़ित परिवारों के लिए न्याय की प्रतीक्षा अभी खत्म नहीं हुई है। अब 5 सितंबर को विशेष NIA अदालत के फैसले से यह स्पष्ट होगा कि अदालत के सामने पेश किए गए सबूतों और गवाहों के आधार पर किन आरोपियों को दोषी ठहराया जाता है।

झीरम घाटी का मामला केवल एक नक्सली हमले का मुकदमा नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ के राजनीतिक और सुरक्षा इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक है। अदालत का फैसला पीड़ित परिवारों के लिए लंबे इंतजार के बाद एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हो सकता है।

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