भारत में आरक्षण की पूरी कहानी: फुले से पूना पैक्ट, मंडल कमीशन और कांशीराम तक

भारत में आरक्षण की पूरी कहानी: फुले से पूना पैक्ट, मंडल कमीशन और कांशीराम तक
भारत में आरक्षण सिर्फ सरकारी नौकरी या शिक्षा में सीटों का मुद्दा नहीं है, बल्कि इसके पीछे सामाजिक प्रतिनिधित्व और ऐतिहासिक भेदभाव का लंबा इतिहास जुड़ा है। देश में जाति आधारित आरक्षण की चर्चा 19वीं सदी से शुरू हुई और आज भी यह भारतीय राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल है।
हाल के वर्षों में जातिगत जनगणना को लेकर बहस ने एक बार फिर आरक्षण और सामाजिक प्रतिनिधित्व के सवाल को केंद्र में ला दिया है। केंद्र सरकार ने अप्रैल 2025 में आगामी जनगणना में जाति की गणना शामिल करने का निर्णय लिया था ।
आरक्षण की मांग सबसे पहले किसने उठाई?
एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में जाति आधारित आरक्षण के विचार की शुरुआती चर्चा 1882 से जुड़ी मानी जाती है। विलियम हंटर और ज्योतिराव फुले ने पिछड़े और वंचित समुदायों के लिए प्रतिनिधित्व और अवसर बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया था।
ज्योतिराव फुले का सामाजिक आंदोलन शिक्षा और सामाजिक बराबरी के सवालों से जुड़ा था। आगे चलकर यही विचार भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व की बहस का महत्वपूर्ण आधार बना।
कम्युनल अवॉर्ड से पूना पैक्ट तक पहुंचा विवाद
आरक्षण के इतिहास में 1932 का साल बेहद महत्वपूर्ण है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड ने कम्युनल अवॉर्ड के तहत ‘डिप्रेस्ड क्लासेज’ सहित विभिन्न समुदायों के लिए अलग निर्वाचन व्यवस्था का प्रावधान किया था।
डॉ. भीमराव आंबेडकर दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र के पक्ष में थे, जबकि महात्मा गांधी इसका विरोध कर रहे थे। इसके बाद 24 सितंबर 1932 को गांधी और आंबेडकर के बीच समझौता हुआ, जिसे पूना पैक्ट कहा गया ।
पूना पैक्ट के तहत अलग निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था के बजाय संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र में आरक्षित सीटों का प्रावधान किया गया। समझौते में प्रांतीय विधानसभाओं में ‘डिप्रेस्ड क्लासेज’ के लिए आरक्षित सीटों की व्यवस्था भी की गई थी।
संविधान में आरक्षण को मिला आधार
आज का आरक्षण ढांचा स्वतंत्र भारत के संविधान से जुड़ा है। संविधान ने समानता के सिद्धांत के साथ सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए विशेष प्रावधानों का रास्ता बनाया।
डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में संविधान निर्माण के दौरान सामाजिक भेदभाव और प्रतिनिधित्व का प्रश्न बेहद महत्वपूर्ण रहा। आरक्षण का उद्देश्य केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि उन समुदायों को संस्थागत प्रतिनिधित्व और अवसर देना भी था जिन्हें लंबे समय तक सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा।
मंडल कमीशन ने बदली OBC आरक्षण की राजनीति
आरक्षण के इतिहास में अगला बड़ा मोड़ मंडल कमीशन से आया। 1979 में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान तथा उनके उत्थान के उपाय सुझाने के लिए आयोग बनाया गया। इसके अध्यक्ष बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री बीपी मंडल थे।
आयोग ने 1980 में अपनी रिपोर्ट पेश की और OBC के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की। केंद्र सरकार ने 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा की, जिसके बाद देशभर में व्यापक राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया देखने को मिली।
कांशीराम और आरक्षण से आगे बहुजन राजनीति
आरक्षण और दलित राजनीति की चर्चा कांशीराम के बिना अधूरी मानी जाती है। उन्होंने सरकारी कर्मचारियों और वंचित समुदायों को संगठित करने के उद्देश्य से BAMCEF जैसे संगठन के जरिए अपना सामाजिक-राजनीतिक अभियान आगे बढ़ाया।
बाद में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की। कांशीराम ने सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक भागीदारी को बहुजन आंदोलन के केंद्र में रखा। उनके नारों ने उत्तर भारत की राजनीति में सामाजिक न्याय और ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी’ जैसी बहस को मजबूत किया।
आज फिर क्यों चर्चा में है जातिगत जनगणना?
आरक्षण पर बहस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह सवाल है कि अलग-अलग सामाजिक समूहों की वास्तविक आबादी कितनी है। लंबे समय से OBC की आबादी के आंकड़ों को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस होती रही है।
केंद्र सरकार ने अप्रैल 2025 में आगामी जनगणना में जाति की गणना शामिल करने का फैसला किया। सरकार के अनुसार, जाति गणना को मुख्य जनगणना का हिस्सा बनाया जाएगा ।
इस फैसले के बाद जातिगत आंकड़े, सामाजिक प्रतिनिधित्व और आरक्षण की सीमा को लेकर बहस आगे और तेज होने की संभावना है।
आरक्षण की कहानी सिर्फ प्रतिशत की नहीं
भारत में आरक्षण की पूरी कहानी को केवल SC, ST या OBC के प्रतिशत से समझना मुश्किल है। इसकी जड़ें सामाजिक भेदभाव, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, शिक्षा और सरकारी सेवाओं में अवसर से जुड़ी हैं।
1882 की शुरुआती बहस से लेकर 1932 के पूना पैक्ट, संविधान, मंडल कमीशन और कांशीराम के बहुजन आंदोलन तक आरक्षण की राजनीति लगातार बदलती रही है। आज जातिगत जनगणना ने इस बहस को एक नए चरण में पहुंचा दिया है।
यही वजह है कि भारत में आरक्षण का सवाल केवल ‘किसे कितना आरक्षण’ का मुद्दा नहीं, बल्कि ‘किसकी कितनी भागीदारी’ और सामाजिक न्याय के बड़े सवाल से जुड़ा हुआ है।



