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कभी रेल हादसों ने छीनी कुर्सी, कभी घोटालों ने बढ़ाया दबाव… जानिए किन वजहों से भारत में मंत्रियों को देना पड़ा इस्तीफा

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे ने एक बार फिर इस सवाल को चर्चा में ला दिया है कि क्या बड़े विवादों के बाद मंत्री पद छोड़ना राजनीतिक जवाबदेही का हिस्सा होता है। भारत के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो ऐसे कई मौके मिलते हैं, जब दुर्घटनाओं, भ्रष्टाचार के आरोपों, सुरक्षा चूक और जनदबाव के चलते मंत्रियों ने अपनी कुर्सी गंवाई।

नीट पेपर लीक विवाद और प्रतियोगी छात्रों के लगातार विरोध के बीच शिक्षा मंत्रालय में बड़ा बदलाव देखने को मिला। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपना पद छोड़ दिया, जिसके बाद शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी अतिरिक्त प्रभार के रूप में प्रह्लाद जोशी को सौंप दी गई। इस घटनाक्रम ने राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर यह बहस शुरू कर दी है कि क्या बड़े विवादों के बाद सिर्फ मंत्री बदलना पर्याप्त होता है या व्यवस्था में व्यापक सुधार भी उतने ही जरूरी हैं।

जब एक रेल दुर्घटना ने बदल दी राजनीतिक परंपरा

स्वतंत्र भारत में नैतिक जवाबदेही की सबसे चर्चित घटनाओं में लाल बहादुर शास्त्री का नाम सबसे पहले लिया जाता है। वर्ष 1956 में तमिलनाडु के अरियालुर रेल हादसे में बड़ी संख्या में लोगों की जान जाने के बाद उन्होंने रेल मंत्री पद छोड़ दिया। उस फैसले को आज भी सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही की मिसाल माना जाता है।

मुंबई हमलों के बाद गृह मंत्रालय में हुआ बदलाव

26 नवंबर 2008 के आतंकी हमलों ने पूरे देश को झकझोर दिया था। सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठने के बाद तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज पाटिल ने अपना इस्तीफा सौंप दिया। बाद में पी. चिदंबरम को गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई।

रेल हादसे के बाद नीतीश कुमार ने ली नैतिक जिम्मेदारी

1999 के गैसल रेल हादसे में सैकड़ों लोगों की मौत के बाद तत्कालीन रेल मंत्री नीतीश कुमार ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए प्रधानमंत्री को अपना इस्तीफा सौंपा था।

घोटालों ने भी छीनी कई मंत्रियों की कुर्सी

देश के चर्चित 2जी स्पेक्ट्रम विवाद के दौरान दूरसंचार मंत्री ए. राजा को पद छोड़ना पड़ा। इसके कुछ वर्षों बाद कोयला ब्लॉक आवंटन विवाद में कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने भी इस्तीफा दिया। दोनों मामलों में राजनीतिक विवाद लगातार बढ़ते गए और सरकार पर जवाबदेही का दबाव बना रहा।

मुंद्रा कांड से लेकर रेलवे भर्ती विवाद तक

स्वतंत्र भारत के शुरुआती बड़े वित्तीय विवादों में शामिल मुंद्रा कांड के बाद तत्कालीन वित्त मंत्री टी.टी. कृष्णमाचारी को इस्तीफा देना पड़ा। वहीं वर्ष 2013 में रेलवे बोर्ड भर्ती रिश्वत मामले के बाद तत्कालीन रेल मंत्री पवन कुमार बंसल ने भी अपना पद छोड़ दिया, हालांकि उन पर सीधे आरोप नहीं लगे थे।

#MeToo आंदोलन की गूंज मंत्रिमंडल तक पहुंची

साल 2018 में #MeToo अभियान के दौरान कई महिला पत्रकारों ने तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री एम. जे. अकबर पर आरोप लगाए। मामला राष्ट्रीय बहस का विषय बना और बढ़ते सार्वजनिक दबाव के बीच उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

विवादों में रहे दूसरे बड़े नाम

पूर्व पेट्रोलियम मंत्री केशव देव मालवीय को खनन लाइसेंस विवाद के बाद पद छोड़ना पड़ा था। वहीं ललित नारायण मिश्रा भी वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों को लेकर लंबे समय तक राजनीतिक विवादों के केंद्र में रहे और उन्हें भी मंत्रिमंडल से बाहर होना पड़ा।

लेकिन कहानी सिर्फ इस्तीफों की नहीं…

भारतीय लोकतंत्र में हर मंत्री का इस्तीफा अलग परिस्थिति में हुआ है। कहीं हादसे के बाद नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार की गई, कहीं भ्रष्टाचार के आरोपों ने सरकारों को घेरा, तो कहीं जनता के गुस्से और राजनीतिक दबाव ने फैसले बदल दिए। इसलिए किसी मंत्री का पद छोड़ना सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं होता, बल्कि यह उस दौर की शासन व्यवस्था, जनभावनाओं और जवाबदेही की संस्कृति का भी प्रतिबिंब माना जाता है।

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