50 साल बाद खुलने लगा अमेरिका का ‘न्यूक्लियर मकबरा’! समुद्र ने बढ़ाई चिंता, रेडियोधर्मी कचरे पर मंडराया बड़ा खतरा
प्रशांत महासागर के बीच स्थित रुनिट डोम (Runit Dome) एक बार फिर दुनिया की चिंता का कारण बन गया है। करीब 50 साल पहले अमेरिका ने परमाणु परीक्षणों से निकले रेडियोधर्मी कचरे को इस विशाल कंक्रीट संरचना के नीचे दबाया था। अब वैज्ञानिकों का कहना है कि समुद्र का बढ़ता जलस्तर, कंक्रीट में दरारें और पानी का रिसाव इस संरचना के लिए गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं।
रुनिट डोम, जिसे ‘द टॉम्ब’ या ‘न्यूक्लियर टॉम्ब’ भी कहा जाता है, प्रशांत महासागर में स्थित मार्शल आइलैंड्स के रुनिट द्वीप पर बना है। यह विशाल कंक्रीट का गुंबद लगभग 377 फीट व्यास और करीब 18 इंच मोटी छत वाला ढांचा है।
इसे 1970 के दशक के आखिर में अमेरिकी सरकार ने उस रेडियोधर्मी कचरे को सुरक्षित रखने के लिए तैयार कराया था, जो शीत युद्ध के दौरान किए गए परमाणु परीक्षणों के बाद जमा हुआ था।
1.20 लाख टन रेडियोधर्मी कचरा दफन
रिपोर्टों के मुताबिक इस डोम के नीचे करीब 1,20,000 टन रेडियोधर्मी सामग्री दबाई गई है। इसमें रेडियोधर्मी राख, दूषित मिट्टी, पेड़-पौधे, सैन्य मलबा और कंक्रीट का मलबा शामिल है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यहां प्लूटोनियम-239 जैसे अत्यधिक खतरनाक रेडियोधर्मी तत्व भी मौजूद हैं, जिनकी हाफ-लाइफ 24,000 वर्ष से अधिक मानी जाती है। यही कारण है कि इस संरचना की सुरक्षा को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है।
कहां हुई सबसे बड़ी चूक?
विशेषज्ञों का कहना है कि इस परियोजना की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी नींव रही। इंजीनियरों ने लागत कम करने के लिए क्रेटर के निचले हिस्से को पूरी तरह सील नहीं किया।
यह मान लिया गया था कि प्राकृतिक कोरल चट्टानें रेडियोधर्मी पदार्थ को बाहर नहीं निकलने देंगी। लेकिन बाद में पता चला कि कोरल लाइमस्टोन छिद्रयुक्त होता है, जिससे समुद्री पानी आसानी से अंदर-बाहर हो सकता है। यही वजह है कि आज समुद्र का पानी इस परमाणु कचरे वाले क्षेत्र तक पहुंच रहा है।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई मुश्किल
वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ता समुद्री जलस्तर और जलवायु परिवर्तन अब इस संरचना के लिए नई चुनौती बन गए हैं। रिपोर्टों में कंक्रीट की सतह पर दरारें, नीचे से पानी का रिसाव और संरचना की मजबूती पर सवाल उठाए गए हैं। विशेषज्ञों को आशंका है कि यदि भविष्य में समुद्र का स्तर और बढ़ा या संरचना को और नुकसान हुआ तो रेडियोधर्मी पदार्थ पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं।
हालांकि, वैज्ञानिकों के बीच इस बात पर अलग-अलग राय है कि वर्तमान में समुद्री जल में रेडियोधर्मी रिसाव का वास्तविक स्तर कितना है और इससे तत्काल कितना जोखिम है।
वैज्ञानिकों ने क्या चेतावनी दी?
समुद्री वैज्ञानिकों और जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि रुनिट डोम को कभी भी स्थायी समाधान के तौर पर डिजाइन नहीं किया गया था। उनका मानना है कि यह एक अस्थायी व्यवस्था थी, लेकिन अब लगभग पांच दशक बाद इसकी सीमाएं सामने आने लगी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्र का पानी इस क्षेत्र में लगातार आवाजाही कर रहा है, इसलिए इसकी दीर्घकालिक सुरक्षा को लेकर गंभीर समीक्षा की जरूरत है।
अमेरिका और मार्शल आइलैंड्स के बीच विवाद
रुनिट डोम को लेकर अमेरिका और मार्शल आइलैंड्स के बीच लंबे समय से विवाद बना हुआ है।
मार्शल आइलैंड्स की सरकार चाहती है कि अमेरिका इस रेडियोधर्मी कचरे के सुरक्षित प्रबंधन की नई योजना बनाए या इसे हटाकर अपने देश में सुरक्षित स्थान पर ले जाए। वहीं अमेरिका का कहना है कि 1980 के दशक में हुए समझौतों के बाद इस संरचना के रखरखाव की जिम्मेदारी मार्शल आइलैंड्स को सौंप दी गई थी। ऐसे में यह परमाणु कचरे का विशाल गुंबद आज भी प्रशांत महासागर के बीच खड़ा है और जलवायु परिवर्तन के दौर में दुनिया के सामने एक नई पर्यावरणीय चुनौती बनकर उभर रहा है।



