दिल्ली

ऑनलाइन बच्चा गोद दिलाने के नाम पर करोड़ों की ठगी! दिल्ली पुलिस ने फर्जी NGO गिरोह का किया पर्दाफाश

दिल्ली साइबर पुलिस ने ऑनलाइन एडॉप्शन के नाम पर ठगी करने वाले गिरोह का खुलासा किया है। फर्जी NGO, नकली मेडिकल दस्तावेज और झूठे वादों के जरिए निःसंतान दंपतियों से लाखों रुपये ऐंठे जाते थे।

राजधानी दिल्ली में ऑनलाइन बच्चा गोद दिलाने का झांसा देकर लोगों से लाखों रुपये ठगने वाले एक संगठित गिरोह का भंडाफोड़ हुआ है। पुलिस जांच में सामने आया कि आरोपी खुद को चाइल्ड एडॉप्शन से जुड़े संस्थानों और सामाजिक संगठनों का प्रतिनिधि बताकर निःसंतान दंपतियों को अपने जाल में फंसाते थे। पूरी रकम मिलने के बाद आरोपी संपर्क खत्म कर देते थे। दिल्ली पुलिस की साइबर टीम अब इस गिरोह से जुड़े अन्य मामलों और संभावित पीड़ितों की जानकारी जुटा रही है।

इंटरनेट पर तलाश करने वालों को बनाया जाता था निशाना

पुलिस के अनुसार गिरोह ने अलग-अलग ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अपने मोबाइल नंबर और संपर्क विवरण डाल रखे थे। जो लोग इंटरनेट पर कानूनी तरीके से बच्चा गोद लेने की जानकारी खोजते थे, वे सीधे आरोपियों के संपर्क में पहुंच जाते थे।

आरोपी भरोसा दिलाते थे कि वे पूरी तरह वैधानिक प्रक्रिया के तहत नवजात शिशु गोद दिला सकते हैं। शुरुआती बातचीत में वे खुद को अनुभवी और अधिकृत संस्था से जुड़ा बताते थे, जिससे पीड़ितों का विश्वास आसानी से जीत लिया जाता था।

फर्जी दस्तावेजों से बढ़ाया जाता था भरोसा

जब किसी दंपति को संदेह होता या वे दस्तावेज देखने की मांग करते, तब गिरोह का दूसरा सदस्य सक्रिय हो जाता था।

जांच में सामने आया कि नकली NGO की रसीदें, बनावटी अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट, फर्जी मेडिकल रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेज तैयार कर पीड़ितों को भेजे जाते थे। इन कागजात के जरिए यह विश्वास दिलाया जाता था कि बच्चा जन्म लेने वाला है और गोद लेने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है।

बच्चे के सामान तक खरीदवा लेते थे आरोपी

गिरोह केवल दस्तावेजों तक ही सीमित नहीं रहता था। पीड़ित परिवारों को बच्चे के कपड़े, दूध, खिलौने और अन्य जरूरी सामान पहले से खरीदने की सलाह दी जाती थी ताकि उन्हें पूरा विश्वास हो जाए कि जल्द ही बच्चा उन्हें सौंप दिया जाएगा।

निर्धारित तारीख नजदीक आने पर परिवहन, अस्पताल और अंतिम कानूनी प्रक्रिया के नाम पर अतिरिक्त रकम भी जमा कराई जाती थी।

पैसे मिलते ही तोड़ देते थे संपर्क

जैसे ही पूरी रकम आरोपियों के बैंक खातों में पहुंच जाती, वे अपने मोबाइल फोन बंद कर देते और पीड़ितों से हर तरह का संपर्क समाप्त कर देते थे।

कई मामलों में पीड़ित काफी समय तक इंतजार करते रहे, लेकिन न तो बच्चा मिला और न ही जमा की गई रकम वापस मिली। इसके बाद लोगों ने पुलिस से शिकायत की, जिसके आधार पर जांच शुरू हुई।

साइबर पुलिस ने ऐसे खोला पूरा नेटवर्क

एक महिला की शिकायत मिलने के बाद दिल्ली पुलिस की साइबर टीम ने तकनीकी जांच शुरू की। डिजिटल साक्ष्यों, बैंक लेनदेन और मोबाइल रिकॉर्ड के आधार पर पुलिस आरोपियों तक पहुंची।

कार्रवाई के दौरान मुख्य आरोपी सचिन अग्रवाल और उसके सहयोगी राकेश कुमार उर्फ डॉ. आर.के. को गिरफ्तार किया गया। दोनों से पूछताछ कर यह पता लगाया जा रहा है कि उन्होंने देशभर में कितने लोगों को अपना शिकार बनाया।

आरोपियों की पृष्ठभूमि भी आई सामने

पुलिस जांच में पता चला कि मुख्य आरोपी सचिन अग्रवाल उत्तर प्रदेश के बरेली का रहने वाला है और उसने दसवीं तक पढ़ाई की है। वह पहले लकड़ी सप्लाई का काम करता था। उसके खिलाफ पहले भी धोखाधड़ी से जुड़े मामले दर्ज होने की जानकारी सामने आई है।

दूसरा आरोपी राकेश कुमार पेशे से फिजियोथेरेपिस्ट है। पुलिस के अनुसार वह नकली मेडिकल दस्तावेज तैयार करने और गिरोह की विश्वसनीयता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता था। उसके खिलाफ भी पहले से आपराधिक मामले दर्ज बताए जा रहे हैं।

अब अन्य पीड़ितों की तलाश में जुटी पुलिस

दिल्ली पुलिस का मानना है कि यह गिरोह लंबे समय से सक्रिय था और कई राज्यों के लोगों को अपना शिकार बना चुका हो सकता है। पुलिस बैंक खातों, मोबाइल डेटा और ऑनलाइन गतिविधियों की जांच कर रही है ताकि पूरे नेटवर्क का पता लगाया जा सके।

साथ ही अधिकारियों ने लोगों से अपील की है कि बच्चा गोद लेने की प्रक्रिया केवल सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त संस्थाओं और अधिकृत कानूनी व्यवस्था के माध्यम से ही पूरी करें। इंटरनेट पर मिले किसी भी व्यक्ति या संस्था पर बिना सत्यापन के भरोसा करना भारी आर्थिक नुकसान और कानूनी परेशानी का कारण बन सकता है।

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